हरेक मानव जीवन मे चार आश्रम होते हैं जिसे हम अलग-अलग अवधि में जीते हैं उपनिषद काल में पहले आश्रम तीन थे या चार इस विषय में विद्वानों में मतभेद है क्योंकि मनुस्मृति में तीन ही आश्रमों का वर्णन आया है। परन्तु आश्रम चार हैं इस विषय में जाबालोपनिषद में स्पष्ट लिखा है कि
ब्रह्मचर्य आश्रमं समाप्य गृही भवेत्
गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत् ।
अर्थात् ब्रह्मचर्य आश्रम को समाप्त कर गृहस्थी होकर वानप्रस्थी हो तथा वानप्रस्थी होकर सन्यासी हो। इस प्रकार हिन्दू धर्म-व्यवस्था के अनुसार मनुष्य जीवन को निम्न चार आश्रमों में विभाजित किया है, जिनका कि हम यहाँ संक्षिप्त अध्ययन करेंगे:--
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
कमेणैवाश्रमाः प्रोक्ताः कारणादन्यथा भवेत् ।।
उत्पन्न ज्ञानविज्ञानो वैराग्यं परमं गतः ।
प्रवजेद् ब्रह्मचर्याद् तु यदीच्छेत् परमां गतिम्ः ।
दारानाहत्य विधिवन्यथा विविधैर्मखैः ।
यज्ञेदुत्पादयेत् पुत्रान् विरक्तो यदि सन्यसेत् ।।
वानप्रस्थाश्रम गत्वा न गृहं प्रविशेत् पुनः ।
न सन्यासी वन चाथ ब्रह्मचर्य न साधकः । ।
कूर्मपुराण
९ ब्रह्मचर्याश्रम आश्रम हिन्दू आश्रम व्यवस्था के अनुसार सर्वप्रथम आश्रम है। इस आश्रम में व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है। प्रत्येक बालक अपने वर्ण के अनुसार शिक्षा ग्रहण करता है। जैसे ब्राह्मण का बालक वेद का अध्ययन इसके उपाङ्गों के साथ करता है। प्रमुख अध्ययन श्रुतियों का अध्ययन होता है, उसी प्रकार क्षत्रिय बालक धर्म की शिक्षा के साथ-साथ धनुर्वेद का ज्ञान विशेष रूप से करता है। उसी प्रकार वैश्य पुत्र का अध्ययन धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ अथर्ववेद का अध्ययन मुख्य है।ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रविष्ट होने के लिए आयु निश्चत है, प्रायः बाह्मण के बच्चे से ८ वर्ष की अवस्था में क्षत्रिय पुत्र से ११ वर्ष की अवस्था में एवं वैश्य पुत्र से १२ वर्ष की आयु में इस आश्रम प्रवेश का विधान है।
इस आश्रम में व्यक्ति को बड़े संयम से रहना पड़ता है, तथा उसे गुरुओं की सेवा करनी पड़ती है। वायुपुराण में लिखा है कि ब्रह्मचारी दण्ड तथा मैखला मूँज का जनेऊ धारण करे. भूमि पर शयन करे, जटाधारी हो, गुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करे तथा विद्याध्ययन के लिये भिक्षावृत्ति करे ।"
इसी प्रकार मनुस्मृति में लिखा है कि बह्मचारी के लिये मधु, माँस, गन्ध, माला, अच्छे मधुराधि रस, स्त्री, प्राणियों की हिंसा, तैलादि का मर्दन, आँखों में अंजन, जूता पहनना, छत्र धारण करना, काम, क्रोध, लोभ, नाचना गाना, बजाना, जुआ झगड़ा, परनिन्दा, असत्य और स्त्रियों से एकान्त में बात करना तथा दूसरों को चोट पहुँचाना वर्जित है ।"
इस प्रकार से ब्रह्मचर्य आश्रम में रहता हुआ व्यक्ति धर्म की साधना करता है, ज्ञान प्राप्त करता है, जिससे कि वह अपने जीवन के अन्य तीन लक्ष्यों को भी आगे प्राप्त कर सके।
२ गृहस्थाश्रम ब्रह्मचर्याश्रम की समाप्ति के बाद जब व्यक्ति ज्ञानवान हो जाता है, तब उसे सामाजिक धर्म की उपासना का विधान है। इस आश्रम में रहकर मनुष्य अर्थ एवं काम की उपासना करता है। इस आश्रम में रहकर ही वह अनेक ऋणों से मुक्त होता है। अतः गृहस्थाश्रम में मनुष्य प्रवेश करते ही अपना विवाह एवं अर्थ उपार्जन का प्रयत्न अपने-अपने वर्ण के निश्चित व्यवसायों के अनुसार करता है। वायुपुराण के अनुसार गृहस्थाश्रम में व्यक्ति अपने अनुकूल गुण, कर्म और स्वभाव वाली स्त्री के साथ यज्ञ करे, अतिथि सेवा करे ऋषियों एवं पितरों की पूजा करे तथा सन्तानोत्पत्ति करे, संक्षेप में गृहस्थ व्यक्ति का यही धर्म बताया गया है।"
इस प्रकार गृहस्थाश्रम में सर्वप्रथम तो प्रियदर्शनी प्रियवादिनी स्त्री होनी चाहिये, दूसरे इस विवाह का लक्ष्य सन्तानोत्पत्ति होना चाहिये। सन्तानोत्पत्ति से ही व्यक्ति पितृ ऋण से उतॄण हो सकता है। बालक का पालन-पोषण भी उसी का कार्य है। सभी आश्रमवासी भी इस आश्रम पर निर्भर करते हैं, अतः धनोपार्जन करते हुए ऋषि ऋण तथा अतिथि ऋण आदि को यज्ञों द्वारा पूरा करते रहना चाहिये। यज्ञ का तात्पर्य अग्निहोत्र मात्र से नहीं है, अपितु समय-समय पर इनकी तन, मन, धन से सेवा करता है।
३- वानप्रस्थाश्रम जब व्यक्ति अपने सभी ऋणों से मुक्त हो जाता है, एवं काम की उपासना कर लेता है तब उसे अपने जीवन के चरम लक्ष्य की होता है, अतः इस संसार को छोड़कर एकदम से वह मोक्ष के लिए अनुरक्तनहीं हो पाता है, इस स्थिति में वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश का विधान है, जिसमें रहकर वह अपनी मनोवृत्तियों को परमपिता परमेश्वर की ओर केन्द्रित कर सके। जब वह यह करने में सफल हो जाए उस समय उसे संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होना चाहिये। मनुस्मृति में लिखा है "जब गृहस्थ यह देखे कि उसकी शरीर की त्वचा शिथिल हो गई है अर्थात् झुर्रियाँ पड़ गई हैं. बाल पक गये हैं, पुत्र के भी पुत्र हो गया है तब विषयों से रहित होकर वन का आश्रम ले।"
वानप्रस्थ की अवस्था में वायुपुराण के अनुसार व्यक्ति को वल्कल या मृग चर्म धारण करना चाहिये। चावल, कन्द, मूल और फलों का भोजन करना चाहिये। दोनों सन्ध्या समय स्नान करना चाहिये तथा जंगल में रहते हुए नित्यप्रति अग्निहोत्र करना चाहिये। इसी प्रकार मनुस्मृति ने भी विधान किया है कि सब प्रकार के ग्राम्य भौज्य पदार्थ तथा अन्य सब वस्तुओं का परित्याग कर, स्त्री को पुत्रों के समीप छोड़कर अथवा साथ ही लेकर वन को जाए। इस के आगे लिखते हैं कि उसे वानप्रस्थी अवस्था में नित्य स्वाध्याय में निरत रहना चाहिये, अत्यन्त संयमी होना चाहिये, सबको मित्रभाव से देखने वाला होना चाहिये, मन को वश में करने वाला होना चाहिये, नित्य दानशील हो तथा दान न ले एवं सब प्राणियों पर दया करे । इस वानप्रस्थ जीवन में व्यक्ति अपनी समस्त इच्छाओं का दमन करता हुआ, परमात्मा की आराधना में नित्यप्रति अधिकतर मन को लगाता जाए।
४ संन्यासाश्रम जब व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम में रहता हुआ वीतराग हो जाए तथा उसका मन मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वर सान्निध्य में रमने लगे उस समय संन्यास आश्रम को ग्रहण करने का विधान है। मनु महाराज ने विधान किया है कि "आयु के तृतीय भाग को यथोक्त रीति से वन में व्यतीत कर आयु के चतुर्थ भाग में सब प्रकार की आसक्तियों को छोड़ कर परिवाट हो जाए अर्थात् वानप्रस्थी से संन्यासी हो जाए। व्यक्ति संन्यासी होने के पश्चात् जंगल में चला जाता है। वह केवल मात्र मोक्ष का साधन करता है। उसका स्वादों से कोई प्रयोजन नहीं होता है, इसीलिये भिक्षा द्वारा प्राप्त समग्र सामग्री को एक में मिला कर वह एक समय भोजन करता है।
घर के व्यक्ति उसका पुतला जलाकर श्राद्ध कर्म भी कर देते हैं। इसीलिये संन्यासी अपना नाम परिवर्तन कर लेता है। वह एक जगह ठहरता भी नहीं है। उसे एक से अधिक रात्रि किसी स्थान पर व्यतीत नहीं करनी चाहिये।
किसी प्रकार का भी समाज से उसका लगाव नहीं होना चाहिये; हाँ यदि ग्राम में आते समय उसे कोई अनुचित कार्य होता हुआ दिखाई दे तो निर्भीक होकर उसे कह देना चाहिये। इस प्रकार का कठोर जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर सान्निध्य का प्रयत्न करना चाहिये ।
उपर्युक्त चार आश्रमों में हमने देखा कि हिन्दू धर्म के सिद्धान्त, पुरुषार्थं धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष पर आधारित है। इन आश्रमों की व्यवस्था से व्यक्ति को व्यक्तिगत एवं सामाजिक दोनों ही प्रकार की उन्नति का अवसर मिलता था। कितनी अच्छी थी यह परम्परा पर आज हिन्दू समाज में इस व्यवस्था का वर्णन केवल मात्र पुस्तकों में ही रह गया है, जीवन में चरितार्थं नहीं। आज व्यक्ति मुमुक्षु नहीं रहा है। इस का कारण ऐतिहासिक है।
आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व से भारत में विभिन्न संस्कृतियों के घात-प्रतिघात चलते रहे हैं। मोक्ष के बारे में व्यक्ति की विभिन्न धारणाएँ रही हैं। इसके अनन्तर मुक्ति मार्ग के अनेक लोगों ने ईश्वर प्राप्ति के अन्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। अस्तु, भारत में होने वाली राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक उथल-पुथल इस व्यवस्था के भंग होने का एक विशेष कारण है । परन्तु हिन्दू धर्म एक व्यापक धर्म है, उसने जीवन के किसी अङ्ग को नहीं छोड़ा है, अतः आज धार्मिक संकुल की अवस्था में भी हम यहाँ के व्यक्तियों में इन आश्रमों के प्रति आस्था पाते हैं।
आज हिन्दू समाज मोक्ष की कामना तो करता है पर प्रयत्न नहीं। यही कारण है कि वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम में जीवन व्यतीत करने वाले बहुत ही कम व्यक्ति मिलते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम का स्वरूप बदल गया है. इस का कारण देश-काल में होने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक परिवर्तन है। गृहस्थ आश्रम का स्वरूप ज्यों का त्यों है, आज भी तथा आज से जब आश्रम का व्यवस्था का प्रारम्भ हुआ था, इसकी गरिमा को ऋषिओं ने समझा था। आज भी विशुद्ध हिन्दू परिवार में पंच यज्ञ के विधान का पालन होता है।
आज के वैज्ञानिक युग में जब कि हम धर्म की गरिमा को भूल इस स्थिति पर आकर खड़े हो गये है कि क्या करें? वहाँ हम परलोक को तो भूल ही गये एवं इस लोक की साधना भी सफलता से नहीं कर पा रहे है। आज समाज आगे चला जा रहा है, पर उसे यह पता ही नहीं है कि उसका लक्ष्य क्या है? मार्ग क्या है? बस निरन्तर तर्क एवं बुद्धि का प्रश्श्रय ले मीमांसा से कार्य नहीं चलेगा। आज के समाजशास्त्री को इस विषय में बहुत कुछ सोचना एवं अनुसंधान कर समाज को वैज्ञानिक नियोजन से एक दिशा देने का उत्तरदायित्व है।