आइए आपको उस मणि की कहानी सुनाते हैं जिसे मुगलिया दरबारी इतिहासकारों और बाद में वामपंथियो ने इसे कोहिनूर नाम से विख्यात कर दिया। वास्तव में इसका नाम स्यमंतक मणि था। इसे 3200ईसा पूर्व द्वारका के पास गोमती नदी में पाया गया था।
लेकिन इस मणि के साथ एक दुर्भाग्य जुड़ा हुआ था कि यह केवल स्त्रियों के पास ही रहकर भाग्यशाली होता था किसी पुरुष के पास पहुंचते ही उसके विनाश का कारण बन जाता था।
ज्ञात पौराणिक कथाओं में यह सबसे पहले यह मणि द्वारिका गणतंत्र के सामंत सत्राजित के पास था। एक दिन उसका भाई प्रसेनजीत, इसे पहनकर वन में गया, जिसे एक शेर खा गया, फिर शेर को मारकर इसे जामवंत जी ने प्राप्त किया। पर इसकी विशेषता को जानते हुए उन्होंने इसे अपने पुत्री जामवंती को दे दिया। फिर श्री कृष्ण ने जामवंती से विवाह करने के बाद इस मणि को प्राप्त किया, पर यह जामवंती के पास ही रहा। आपको बता दूं,जामवंती के पुत्र साम्ब के कारण ही यादव कुल का विनाश हो गया।
श्री कृष्ण ने अपनी मृत्यु के पहले इसे अपने प्र पौत्र बज्रनाभ को देकर युधिष्ठिर के पास हस्तिनापुर भेज दिया। उनके स्वर्ग गमन के बाद राजा परीक्षित को मिला, जिनकी नागराज तक्षक के काटने से असामयिक मृत्यु हो गई।
फिर यह विभिन्न हिंदू राजाओं के पास होता हुआ आमेर के कछवाहा राजपूतों के पास पहुंचा। आमेर को युद्ध में हराने के बाद यह अलाउद्दीन खिलजी के पास पहुंचा, और फिर खिलजी साम्राज्य के पतन का कारण बन गया। खिलजी वंश के पतन के बाद यह घूमता हुआ दक्षिण भारत के प्रताप रुद्र काकतीय के पास पहुंचा। तुगलक वंश के प्रथम शासक गयासुद्दीन तुगलक ने इसे पाने के लिए अपने पुत्र उलूघ खां, जो बाद में मुहम्मद तुगलक के नाम से विख्यात हुआ।
राजा प्रतापरुद्र काकतीय ने युद्ध हारने के बाद इसे मुहम्मद तुगलक को दिया पर गयासुद्दीन तुगलक का दुर्भाग्य फिर खड़ा हो गया। मुहम्मद तुगलक ने षड्यंत्र करके पिता गयासुद्दीन तुगलक को मार डाला और खुद राजा बन गया। पर इसी हीरे ने उसे चैन से जीने नहीं दिया। फिरोज तुगलक के समय यह हीरा ग्वालियर के मानसिंह तोमर के पास पहुंचा। और यहीं से इसका लिखित इतिहास शुरु होता है। इसका बाबर ने तुजुके बाबरी और हुमायूं ने हुमायूं नामा में किया है। लोधी वंश के तीसरे सुल्तान, बहलोल लोधी ने मानसिंह तोमर के पुत्र विक्रमादित्य तोमर को हराकर पा लिया। लोधी वंश के बाद
यह बाबर को मिला। हीरे ने कमाल दिखाया। शीघ्र ही बाबर मर गया और फिर यह हुमायूं को मिला। इसी मणि के कारण हुमायूं जीवन भर परेशान रहा। और चौसा के युद्ध में हारकर हुमायूं ईरान भाग गया और यह हीरा शेरशाह सूरी को मिला पर दुर्भाग्य पीछे पड़ गया।
कालिंजर दुर्ग की लड़ाई में तोप का गोला फटने से शेरशाह सूरी की भी मौत हो गई। सूरी वंश के बाद यह हिंदू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य को मिला, जिसे पानीपत की दुसरी लड़ाई में हराकर अकबर ने प्राप्त किया। अकबर ने इसकी विशेषता जानकर इसे खजाने में जमा नहीं किया और यही काम जहांगीर ने भी किया। शाहजहां के समय में उथल पुथल के दौरान यह हीरा आगोलकुंडा के कुतुबशाही परिवार में जा पहुंचा। इसके बाद औरंगजेब को इसकी याद आई उसने अपने दूसरे पुत्र आजम खां को गोलकुंडा पर चढ़ाई करके हीरा लाने के लिए भेजा। अपने मंत्री की धोखेबाजी के कारण अंतिम शासक कुली कुतुब शाह मारा गया। इसी कुली कुतुब शाह ने अपनी पत्नी भाग्यमती जिसे हैदर महल के नाम से भी जाना जाता है हैदराबाद नगर बसाया था।
हीरे ने औरंगजेब को भी शांति से जीने नहीं दिया। जीवन के 25 साल उसे दक्षिण भारत में दौड़ते भागते बिताना पड़ा और अंत में देवगिरी के पास उसकी मृत्यु हो गई। फिर उसके वंशजों के पास रहा पर कोई शासक अपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरा।
अंत में मुहम्मद शाह रंगीले को हराकर यह हीरा ईरानी आक्रमणकारी नादिरशाह को मिला। उसकी एक साल बाद उसके भतीजे ने हत्या कर दिया और यह हीरा अहमद शाह अब्दाली को मिला। पर उसके वंशज भी सुखी नहीं रह पाए। अंत में शाहसुजा ने अपनी रक्षा के एवज में इसे महाराजा रणजीत सिंह को दे दिया।
अंतिम आंग्ल सिक्ख युद्ध हारने के बाद सिक्खों के बालक राजा दलीप सिंह को धोखा देकर इंग्लैंड के राजा जार्ज पंचम को दे दिया गया और इसी के साथ ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज डूब गया। और आजकल यह ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के पास है। पर ज्योतिषियों की सलाह पर इसे काटकर दो टुकड़े कर दिया गया।
दो टुकड़ों में भले ही कर दिया लेकिन आज ब्रिटिश अस्त होता हुआ साम्राज्य है, जहां के मुख्य शहर लंदन पर शांतिदूतो का कब्जा हो चुका है और ब्रिक्स से भी नाता टूट चुका है।
इस तरह अन्त में स्यमंतकमणि कोहिनूर हीरा बन गयी। जिस मणि के कारण श्री कृष्ण भी कलंकित किये गये वो मणि किसी को भी शुभ फलदायी कैसे होती?
तो यह रहा हमारे गौरवशाली अतीत का हिस्सा जिसे इतिहासकारों ने विकृत कर दिया।
