[धुंधुकारी का जन्म]आत्मदेव ब्राह्मण और धुंधली ब्राह्मणी की कहानी !

आत्मदेव ब्राह्मण और धुंधली ब्राह्मणी की कहानी


पूर्वकाल की बात है। तुंगभद्रा नदी के तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था। वहाँ सभी वर्गों के लोग अपने-अपने धर्मो का आचरण करते हुए सत्य और सत्कर्मों में तत्पर रहते थे। उस नगर में समस्त वेदो का विशेषज्ञ और समस्त कर्मो में निपुण एक आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था, वह साक्षात् दूसरे सूर्य के समान तेजस्वी था। वह धनी होने पर भी भिक्षा जीवी था।


उसकी प्यारी पत्नी धुंधली कुलीन एवं सुंदरी होने पर भी सदा अपनी बात पर अड़ जाने वाली थी। उससे लोगों की बात करने में सुख मिलता था। उसका स्वाभाव क्रूर था। बात बात में विवाद करती थी। गृहकार्य में तो निपुण थी,लेकिन कृपण थी, और झगड़ालू भी थी। फिर भी दोनों ब्राह्मण दम्पति प्रेम से घर में रहते। उनके पास अर्थ और भोग-बिलास की सामग्री बहुत थी। परन्तु उससे उन्हे सुख नहीं था। जब अवस्था बहुत ढल गयी, तब उन्होंते संतान प्राप्ति के लिए तरह तरह के दान पुण्य आदि कार्य किये। इस प्रकार धर्म कार्य में उन्होंने अपना आधा धन समाप्त कर दिया, तो भी उन्हें पुत्र या पुत्री किसी का भी मुख देखने को न मिला। इसलिये अब वह ब्राह्मण बहुत ही चिंतातुर रहने लगा।


एक दिन वह ब्राह्मण देवता बहुत दुखी होकर घर से निकल कर वन को चल दिया। दोपहर के समय उसे प्यास लगी, इसलिये वह एक तालाब पर आया। सन्तान के अभाव के दुःख ने उसके शरीर कों बहुत सुखा दिया था, इसलिये थक जाने के कारण जल पीकर वह वहीं बैठ गया। बैठे हुए दो घड़ी बीत गए थे तभी वहां पर एक संन्यासी महात्मा आये। जब ब्राह्मण देवता ने देखा कि वे जल पी चुके हैं, तब वह उनके पास गया और चरणो में नमस्कार करने के बाद सामने खड़े होकर लंबी लंबी साँसें लेने लगा।


सन्यासी ने पूछा-कहो, ब्राह्मण-देवता! रोते क्यों हो? ऐसी तुम्हें क्या भारी चिन्ता है ? तुम जल्दी ही मुझे अपने दुःख का कारण बताओ।


ब्राह्मण ने कहा-महाराज! मैं अपने पूर्वजन्म के पापों से संचित दुःख का क्या वर्णन कहूँ;? अब मेरे पितर मेरे द्वारा दी हुई जलांजलि के जल को अपनी चिन्ता जनित साँस से कुछ गरम करके पीते हैं। देवता और ब्राह्मण मेरा दिया हुआ अन्न प्रसन्न मन से स्वीकार नहीं करते। सन्तान के लिये मैं इतना दुखी हो गया हूँ कि मुझे सब सूना- ही-सूना दिखायी देता है। मैं प्राण त्यागने के लिये यहाँ आया हूँ। सन्तानहीन जीवन को धिक्कार है, सन्तानहीन गृह कों धिक्कार है! सन्तानहीन धन कों धिक्कार है। और सन्तानहीन कुल को धिक्कार है। मैं जिस गाय को पालता हूँ, वह भी सर्वथा बांझ हो जाती है; जो पेड़ लगाता हूँ, उस पर भी फल-फूल नहीं लगते। मेरे घर में जो फल आता है, वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है। जब मैं ऐसा अभागा और पुत्रहीन हूँ, तब फिर इस जीवन कों ही रखकर मुझे क्या करना है। यों कहकर वह ब्राह्मण दुःख से व्याकुल हो उन संन्यासी महात्मा के पास फूट-फूटकर रोने लगा।


तब उन मुनिवर के हृदय में बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। वे योगनिष्ठ थे; उन्होंने उसके ललाट की रेखाएँ देखकर सारा वृतांत जान लिया और फिर उसे विस्तारपूर्वक कहने लगे।


संन्यासी ने कहा- ब्राह्मण-देवता! इस प्रजाप्राप्ति का मोह त्याग दो। कर्म की गति प्रबल है, विवेक का आश्रय लो। मैंने इस समय तुम्हारा प्रारव्ध देखकर निश्चय किया है कि सात जन्म तक तुम्हारे कोई सन्तान किसी प्रकार नहीं हो सकती। पूर्वकाल में राजा सगर को उनके पुत्रो के कारण दुःख भोगना पड़ा था। ब्राह्मण ! अब तुम कुटुंब की आशा छोड़ दो। संन्यास में ही सब प्रकार का सुख है।


ब्राह्मण ने कहा - महात्मा जी! विवेक से मेरा क्या होगा। मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिये; नहीं तो मैं आपके सामने ही शोकमूर्च्छित होकर अपने प्राण त्यागता हूँ। जिसमें पुत्र-स्त्री आदि का सुख नहीं है, ऐसा संन्यास तो सर्वथा नीरस ही है। लोक में सरस तो पुत्र- पौत्रादि से भरा-पूरा गृहस्थाश्रम ही है।


ब्राह्मण का ऐसा आग्रह देखकर उन तपोधन ने कहा- विधाता के लेख को मिटाने पर राजा चित्रकेतु को बड़ा दुःख उठाना पड़ा था। उस पुरुष के समान तुमको भी पुत्र सुख नहीं मिल सकेगा। तुमने तो बड़ा हठ पकड़ रखा है और अर्थी के रूप में तुम मेरे सामने उपस्थित हो; ऐसी दशा में मैं तुमसे क्या कहूँ.


जब महात्माजी ने देखा कि यह किसी प्रक्रार अपना आग्रह नहीं छोड़ता, तब उन्होंने उसे एक फल देकर कहा- इसे तुम अपनी पत्नी कों खिला देना, इससे उसके एक पुत्र होगा । तुम्हारी स्त्री को एक साल तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम रखना होगा। यदि वह ऐसा करेगी तो वह बालक बहुत ही शुद्ध स्वाभाव वाला होगा। ये कहकर वो योगीराज चले गए और वो ब्राह्मण आत्मदेव भी ख़ुशी खुशी घर को लौटने लगा।


घर आकर उसने वह फल अपनी स्त्री को दे दिया और फिर कही चला गया। उसकी स्त्री कुटिल स्वाभाव की थी, रो रोकर अपनी पड़ोसन सखी से कहने लगी - "सखी" मुझे तो बड़ी चिंता हो गयी है, में तो यह फल नहीं खाऊंगी। ये फल खाने से मेरा गर्भ ठहर जायेगा और मेरा पेट निकल आएगा। मुझसे कुछ भी खाया पीया नहीं जायेगा, शक्ति भी क्षीण हो जाएगी। तो तू ही बता, घर का काम धंधा कौन देखेगा, ये घर कैसे चलेगा, और कही गांव में डाकुओं का आक्रमण हो गया तो एक गर्भिणी स्त्री कैसे भागेगी? और यदि कही यह शुकदेव की तरह गर्भ पेट में ही रह गया तो में क्या करूँगी, इसे बाहर कैसे निकाला जायेगा? और यदि प्रसवकाल में कही टेड़ा हो गया तो प्राणो से हाथ भी धोने होंगे। मैं सुकुमारी भला यह सब कैसे सह सकुंगी। दुर्बल होने की स्थिति में मेरी नंदरानी मेरा सारा माल समेट ले जाएगी। और तो और मुझसे ये सत्य, शौंच के नियम भी कैसे पालन होंगे? जो स्त्री बच्चे को जन्म देती है वो बड़ा ही कष्ट भोगती है। मेरे विचार से बांझ या विधवा स्त्री ही सुखी रहती है।


मन में ऐसे ही तरह-तरह के कुतर्क उठने से उसने वह 'फल नहीं खाया और जब उसके पति ने पूछा फल खा लिया ?' तब उसने कह दिया- 'हाँ, खा लिया'

एक दिन उसकी बहिन अपने-आप ही उसके घर आयी; तब उसने अपनी बहिन को साथ वृतांत सुनाकर कहा कि "मेरे मन में इस फल को लेकर बड़ी चिन्ता है, मैं इस दुःख के कारण दिनों दिन दुबली हो रही हूँ। बहिन! मैं क्या कहूँ?" बहिन ने कहा, "मेरे पेट में बच्चा है, प्रसव होनेपर वह बालक मैं तुझे दे दूँगी। तब तक तू गर्भवती के समान घरमें गुप्त रूप से सुख से रह। तू मेरे पति कों कुछ घन दे देगी तो वे तुझे अपना बालक दे देंगे। (हम ऐसी युक्ति करेंगी) कि जिसमें सब लोग यही कहें कि 'इसका बालक छः महीने का होकर मर गया' और मैं नित्यप्रति तेरे घर आकर उस बालक का पालन-पोषण करती रहूँगी। तू इस समय इसकी जाँच करने के लिये यह फल गौ कों खिला दे।'


ब्राह्मणी ने अपने स्वाभाववश जो-जो उसकी बहिन ने कहा था, वैसे ही सब किया। इसके पश्चात् समयानुसार जब उस स्त्री के पुत्र हुआ, तब उसके पति ने चुपचाप लाकर उसे धुंधली कों दे दिया और उसने आत्मदेव को सूचना दे दी कि मेरे सुखपूर्वक बालक हो गया है। इस प्रकार आत्मदेव के पुत्र हुआ सुनकर सब लोगों को बड़ा आनन्द हुआ। ब्राह्मण ने उसका जातकर्म-संस्कार करके अन्य ब्राह्मणों को दान दिया। और उसके द्वार पर गाना बजाना तथा अनेक प्रकार के मांगलिक कृत्य होने लगे। धुंधली ने अपने पति से कहा- "मेरे स्तनों में तो दूध ही नहीं है। तो फिर में इस बालक का गौ के दूध से लालन पालन करूँगी। मेरे बहन के यहाँ भी संतान हुयी थी लेकिन वो मर गया है, में उसे ही बुला लेती हु वो उसका सही से लालन पालन कर सकती है। तब अपने पुत्र की रक्षा के लिए आत्मदेव ने वैसा ही काम किया। माता धुंधली ने ही इस पुत्र का नाम धुंधकारी रखा।


इसी समय ब्राह्मण की गाय के तीन महीने बीत जाने पर एक मनुष्यकार बच्चा पैदा हुआ वह सर्वांग सुन्दर, दिव्य, निर्मल तथा सुवर्ण की कांति वाला था।


उसे देखकर ब्राह्मण देवता कों बड़ा आनन्द हुआ और उसने स्वयं ही उसके सब संस्कार किये। इस समाचार से और सब लोगों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बालक को देखने के लिये आये तथा आपस में कहने लगे,' देखो, भाई ! अब आत्मदेव का कैसा भाग्य उदय हुआ है! कैसे आश्चर्य की बात है कि गौ के भी ऐसा दिव्यरूप बालक उत्पन्न हुआ है' दैवयोग से इस गुप्त रहस्थ का किसी को भी पता न लगा। आत्मदेव ने उस बालक के गौ के-से कान देखकर उसका नाम 'गो कर्ण' रखा।


कुछ काल बीतने पर वे दोनों बालक जवान हो गये। उनमें गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ, किन्तु धुंधकारी बड़ा ही दुष्ट निकला। खान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारों का उसमें नाम भी न था और न खान-पान का ही कोई परहेज था। क्रोध उसमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था। वह बुरी वस्तुओं का संग्रह किया करता था। दूसरों की चोरी करना और सब लोगों से द्वेष बढ़ाना उसका स्वभाव बन गया था। छिपे-छिपे वह दूसरों के घरो में आग लगा देता था। दूसरों के बालको को खिलाने के लिये गोद में लेता और उन्हें चट कुएँ में डाल देता। हिंसा का उसे व्यसन-सा हो गया था। हर समय वह अस्त्र शस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दीन-दुखियों को व्यर्थ तंग करता।


चाण्डालो से उसका विशेष प्रेम था; बस हाथ में फंदा लिये कुत्तों की टोली के साथ शिकार की टोह में घूमता रहता। वेश्याओं के जाल में फंसकर उसने अपने पिता की सारी सम्पत्ति नष्ट कर दी। एक दिन माता-पिता कों मार-पीटकर घर के सब बर्तन-भाँड़े उठा ले गया।


इस प्रकार जब सारी सम्पत्ति स्वाहा हो गयी, तब उसका कृपण पिता फूट-फूटकर रोने लगा और बोला- 'इससे तो इसकी माँ का बाँझ रहना ही अच्छा था; कुपुत्र तो बड़ा ही दुःखदायी होता है। अब मैं कहाँ रहूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे इस संकट कों कौन काटेगा ? हाय ! मेरे ऊपर तो बड़ी विपत्ति आ पड़ी है, इस दुःख के कारण अवश्य मुझे एक दिन प्राण छोड़ने पड़ेंगे।


उसी समय परम ज्ञानी गो कर्ण जी वहाँ आये और उन्होंने पिता को वैराग्य उपदेश करते हुए बहुत समझाया। वे बोले,' पिताजी ! यह संसार अ सार है। यह अत्यन्त दुःखरूप और मोह में डालने वाला है। पुत्र किसका ? धन किसका? स्नेहवान पुरुष रात-दिन दीपक के समान जलता रहता है। सुख न तो इंद्रा को है और न चक्रवर्ती राजा को ही सुख है। सुख है तो केवल विरक्त, एकान्त जीवी मुनि को। 'यह मेरा पुत्र है' इस अज्ञान कों छोड़ दीजिये। मोह से नरक की प्राप्ति होती है। यह शरीर तो नष्ट होगा ही। इसलिये सब कुछ छोड़कर वन में चले जाने को तैयार हो गया और उनसे कहने लगा, बेटा ! वन में रहकर मुझे क्या करना चाहिये, यह मुझसे विस्तारपूर्वक कहो। मैं बड़ा मूर्ख हु. अब तक कर्मवश स्नेहपाश में बंधा हुआ अपंग की भाँति इस घर रूप अँधेरे कुएँ में ही पड़ा रहा हूँ। तुम बड़े दयालु हो, इससे मेरा उद्धार करो।


गो कर्ण ने कहा-पिताजी ! यह शरीर हड्डी, मांस और रुधिर का पिण्ड है; इसे आप "मैं" मानना छोड़ दें और स्त्री-पुत्रादि कों 'अपना' कभी न मानें। इस संसार को रात-दिन क्षणभंगुर देखें, इसकी किसी भी वस्तु को स्थायी समझकर उसमें राग न करें। बस, एकमात्र वैराग्य- रस के रसिक होकर भगवान की भक्ति में लगे रहें।


भगवद भजन ही सबसे बड़ा धर्म है, निरन्तर उसी का आश्रय लिये रहें। अन्य सब प्रकार के लौकिक धर्मो से मुख मोड़ लें। सदा साधुजनो की सेवा करें। भोगों की लालसा को पास न फटकने दें तथा जल्दी-से-जल्दी दूसरों के गुण-दोषों का विचार करना छोड़कर एकमात्र भगवत्सेवा और भगवान् की कथाओ के रसका ही पान करें।


इस प्रकार पुत्र की वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेव ने घर छोड़ दिया और वन की यात्रा की। 


गोकर्ण के पिता के वन को चले जाने पर, योगनिष्ठ गोकर्ण भी तीर्थ यात्रा के लिए निकल गए। क्यूंकि उन्हें परिवार का माया मोह नहीं थी। न उनका कोई शत्रु था और न कोई मित्र। पिता के वन जाने के बाद घर में केवल मां और धुंधकारी ही बचे थे। एक दिन धुंधकारी ने अपनी मां को बहुत पीटा और कहा - "बता धन कहाँ छुपा कर रखा है?". जल्दी बता, नहीं तो इस जलती लकड़ी से अंग भंग कर दूंगा। पुत्र के इस प्रकार के रोज़ रोज़ के उपद्रव से तंग आकर मां ने कुएँ में छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। माता के स्वर्गवास के बाद, धुंधकारी 5 वेश्याओ के साथ रहने लगा। धीरे धीरे उनके लिए धन, भोग्य सामग्री को एकत्रतित करने को लेकर क्रूर कर्म करने लगा। उनके कहने पर वह चोरी करने लगा, एक दिन वह बहुत से कपडे और आभूषण लेकर लौटा तो उन वेश्याओ ने सोचा ये पता नहीं कहाँ कहाँ से चोरी करके ये धन और आभूषण लाया है, इसे पता नहीं कब राजा पकड़ कर मृत्यु दंड दे दे, इसलिए हम सभी इसको मारकर इसके धन का बटवारा कर ले। ऐसा सोचकर उन्होंने उसके सो जाने के बाद उसके गले में रस्सी का फंदा कस दिया, लेकिन वो बलशाली था इससे वो सभी वेश्याए डर गयी. उन्होंने तुरंत भट्टी में से कोयले निकालकर उसके मुँह पर डाल दिया जिससे धुंधकारी तड़प तड़प कर मर गया। उन्होंने उसके शरीर को एक गड्ढे में डालकर मिटटी डाल दी। फिर वे वेश्याएँ धन आपस में बांट लिए। लोगो के पूछने पर कह देती की वो हमारे लिए धन कमाने गए है शीघ्र ही आ जायेगे।


धुंधकारी अपने कुकर्मो के कारण एक प्रेत बन गया था। वह ववण्डर बनकर एक दिशा से दूसरी दिशा में भटकता रहता। कही पर भी एक पल को नहीं ठहर पता था। बस है-देव है-देव चिल्लाता रहता था। परन्तु उसकी कोई सहायता नहीं करता।


जब गोकर्ण ने अपने भाई धुंधकारी के मृत्यु का समाचार सुना तो उन्होंने तुरंत उसको अनाथ समझकर गोदान और श्राध्द किया। इस प्रकार गोकर्ण घूमते फिरते एक दिन अपने ही नगर में आ पहुंचे तो उन्होंने सोचा क्यों न रात अपने ही घर में बितायी जाए, जब घर है तो। फिर वो अपने घर आकर बीच आँगन में सो जाते है।

लेकिन उसी घर में उसका भाई धुंधकारी भी प्रेत बना छुपा हुआ था। जब उसको पता चला की गोकर्ण ही लेटा है तो वह तरह तरह के रूप दिखाने लगा। कभी अग्नि बनता, कभी हाथी, कभी घोडा, और पता नहीं क्या क्या।


गोकर्ण ने सोचा अवश्य ही कोई दुर्गति को प्राप्त हुयी आत्मा है। तब उन्होने उससे बड़े धैर्य से पूछा।


गोकर्ण ने कहा - तू कौन है? रात्रि के समय ऐसे भयानक रूप क्यों दिखा रहा है। तेरी ये दशा कैसे हुए, मुझे बताओ तो सही।


गोकर्ण के इस प्रकार पूछने पर प्रेत धुंधकारी जोर जोर से रोने लगा और बोला - "मैं तुम्हारा ही भाई धुंधकारी हु, मैंने अपने कुकर्मो से इस दशा को प्राप्त हुआ हु. अब दैववश कर्मफल का उदय होने से केवल वायु भक्षण करके जी रहा हु। भाई तुम तो दया के सागर हो, जैसे पिता का उद्धार किया वैसा ही मेरा मार्गदर्शन करे।

गोकर्ण ने कहा- मैंने तुम्हारे लिए विधिपूर्वक पिंडदान किया था। फिर भी तुमको मुक्ति नहीं मिली तो फिर अब कुछ नहीं हो सकता।


अगर तुमको कुछ ज्ञात है तो निश्चिन्त होकर कहो। की अब मुझे क्या करना चाहिए।


प्रेत ने कहा- भाई! मेरी मुक्ति सैकड़ो बार पिंडदान और श्राद्ध करने से भी नहीं हो सकती, इसका उपाय आप ही को खोजना होगा।


प्रेत की बात सुनकर गोकर्ण महाराज को बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने धुंधकारी से कहा तुम निर्भय होकर अपने स्थान पर जाओ, मैं कुछ न कुछ उपाय खोजता हु। गोकर्ण की आज्ञा से धुंधकारी वहाँ से चला गया और गोकर्ण महाराज लेटे लेटे धुंधकारी की मुक्ति का उपाय सोचने लगे। लेकिन कोई उपाय नहीं सोचा, तो प्रातःकाल होते ही वे विद्वानों और ज्ञानीजनो के पास गए रात की घटना कह सुनाई। सबने अपने अपने ग्रन्थ, उलट पलट कर देखे पर उपाय न सुझा। सबने उनको सूर्य नारायण भगवान् की शरण में जाने को बोला।

गोकर्ण महाराज ने अपने तपोबल से सूर्य नारायण की गति रोककर उनकी स्तुति की, और पूछा "भगवन आप इस समस्त संसार के साक्षी है। सर्व ज्ञाता है। मै आपको नमस्कार करता हु, भगवन आप कृपा करके धुंधकारी प्रेत की मुक्ति का साधन बताइये।


सूर्य नारायण भगवान बोले गोकर्ण तुम श्रीमद भागवत महापुराण का आयोजन करो। उससे मुक्ति संभव है। तुम उसका सप्ताह परायण अनुष्ठान करो।


तब सबने बोला बिलकुल यही करो। यह उपाय सरल है। तब गोकर्ण महाराज भी निश्चय करके कथा सुनाने को तैयार हो गए। फिर गोकर्ण महाराज व्यास की गद्दी पर बैठकर कथा कहने लगे, लोगो को पता लगा तो वहाँ भीड़ का ताँता लग गया। सब अनुशासन के साथ बैठ गए। इतने में वह धुंधकारी प्रेत भी आ गया। वह इधर उधर बैठने का स्थान खोजने लगा। फिर उसने वहाँ सीधे रखे हुए सात गांठ के बांस को देखा, वह उसी में प्रवेश करके कथा को सुनने लगा।


गोकर्ण महाराज ने एक वैष्णव ब्राह्मण को श्रीमद भागवत महापुराण कथा का मुख्य श्रोता बनाया। और प्रथम स्कंध से ही कथा सुनानी शुरू की।


शाम को जब कथा समाप्त हुई तो वह एक आश्चर्य जनक घटना हुए। बांस की एक गांठ फट गयी, अब उसमे छः गांठ शेष बची। इसी प्रकार दूसरे दिन दूसरी, तीसरे दिन तीसरी गांठ टूट गयी। इस प्रकार सातों दिन सात गांठ को फोड़कर धुंधकारी श्रीमद भागवत महापुराण के 12 स्कंध को सुनकर पवित्र हो गया, और उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल गयी।


उसने तुरंत अपने भाई को प्रणाम करके बोला। भाई तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की, आपने मुझे प्रेत योनि से मुक्त कर दिया। प्रेत योनि से भी मुक्ति दिलाने की शक्ति सिर्फ इस श्रीमदभागवत कथा में है। जिस प्रकार आग गीली और सूखी सभी प्रकार की लकड़ियों को जला डालती है वैसे ही इस कथा के सप्ताह श्रवण से मन वचन कर्म इत्यादि के द्वारा हुए पाप भी जलकर नष्ट हो जाते है।


जिस समय धुंधकारी ये सब बाते कर रहा था उसी समय एक तेज़ प्रकाश के साथ आकाश से विमान उतरा जिसमे बैकुंठ धाम के पार्षद बैठे हुए थे।


चारो तरफ प्रकाश फैल गया। और उसी समय सभी लोगो के सामने धुंधकारी उस विमान में चढ़ गया। तभी उस विमान में आये पार्षदों से गोकर्ण महाराज बोले।


गोकर्ण ने पूछा- भगवान के प्रिय पार्षदों, इस कथा अमृत का पान यहाँ उपस्थिति सभी जन ने लिया है लेकिन विमान सिर्फ धुंधकारी के लिए आया है, बाकि शुद्ध हृदय जन इसके अधिकारी क्यों नहीं है? इस प्रकार का भेद क्यों हुआ?


भगवान् के सेवक बोले हे गोकर्ण महाराज ! यह भेद इनके मनन के भेद के कारण ही है। यह बात आपकी ठीक है की सबने श्रवण समानरूप से किया है। लेकिन मनन नहीं किया है। मनन करने में सभी के भेद है। किसी ने कथा को कुछ समय तक मनन किया किसी ज्यादा समय। लेकिन इसने तो निराहार रहकर बांस के अंदर सिर्फ मनन ही किया है। इसने जो भी सुना उसका लगातार मनन और चिंतन किया है। जो ज्ञान दृढ़ नहीं होता वह व्यर्थ हो जाता है। इसी प्रकार ध्यान न देने से श्रवण का, संदेह से मन्त्र का, और चित्त के इधर उधर भटकने से, जप का कोई फल नहीं मिलता है। यदि ये श्रोता फिर से श्रीमदभागवत कथा को सुने और मनन करे तो इनका उद्दार भी संभव है।


कथा कैसी लगी कमेंट में अवश्य बताएं और सनातन मिस्ट्री चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें।

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