राजा पृथु की सम्पूर्ण कथा [ ब्रह्म पुराण ]

पूर्व काल की बात है, अत्रि- कुल में उत्पन्न प्रजापति अङ्ग बड़े धर्मात्मा और धर्म के रक्षक थे। वे अत्रि के समान ही तेजस्वी थे। उनका पुत्र वेन था, जो धर्म के तत्त्व को बिलकुल नहीं समझता था। उसका जन्म मृत्यु कन्या सुनीथा के गर्भ से हुआ था। अपने नाना के स्वभाव दोष के कारण वह धर्म को पीछे रखकर काम और लोभ में प्रवृत्त हो गया। उसने धर्म की मर्यादा भङ्ग कर दी और वैदिक धर्मों का उल्लङ्घन करके वह अधर्म में तत्पर हो गया। विनाशकाल उपस्थित होने के कारण उसने यह क्रूर प्रतिज्ञा कर ली थी कि 'किसी को यज्ञ और होम नहीं करने दिया जायगा। भजन करने योग्य, यज्ञ करने वाला तथा यज्ञ भी मैं ही हूँ। मेरे ही लिये यज्ञ करना चाहिये। मेरे ही उद्देश्य से हवन होना चाहिये।' इस प्रकार मर्यादा का उल्लङ्घन करके सब कुछ ग्रहण करने वाले अ योग्य वेन से मरीचि आदि सब महर्षियों ने कहा- 'वेन हम अनेक वर्षोंके लिये यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करने वाले हैं। तुम अधर्म न करो। यह यज्ञ आदि कार्य सनातन धर्म है।' 
महर्षियों को यों कहते देख खोटी बुद्धिवाले वेन ने हँसकर कहा-'अरे! मेरे सिवा दूसरा कौन धर्म का स्रष्टा है। मैं किसकी बात सुनूँ। विद्या, पराक्रम, तपस्या और सत्य के द्वारा मेरी समानता करनेवाला इस भूतल पर कौन है? मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों की और विशेषतः सब धर्मो को उत्पत्ति का कारण हूँ। तुम सब लोग मूर्ख और अचेत हो, इसलिये मुझे नहीं जानते। यदि मैं चाहूँ तो इस पृथ्वी को भस्म कर दूँ, जलमें बहा दूँ या भूलोक तथा द्यु लोक को भी रूध डालूँ। इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है।' 

जब महर्षि गण वेन को मोह और अहङ्कार से किसी तरह हटा न सके, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। उन महात्माओं ने महा बली वेन को पकड़कर बाँध लिया। उस समय वह बहुत उछल कूद मचा रहा था। महर्षि कुपित तो थे ही, वेन की बाएं जङ्घा का मन्थन करने लगे। इससे एक काले रंग का पुरुष उत्पन हुआ, जो बहुत ही नाटा था। वह भयभीत हो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसे व्याकुल देख अत्रि ने कहा- 'निषीद (बैठ जा)।' इससे वह निषाद वंशका प्रवर्तक हुआ और वेन के पाप से उत्पन्न हुए धीवरों की सृष्टि करने लगा। तत्पश्चात् महात्माओं ने पुनः अरणी की भाँति वेन की दाहिनी भुजा का मन्थन किया। उससे अग्रि के समान तेजस्वी पृथु का प्रादुर्भाव हुआ। वे भयानक टंकार करने वाले आजगव नामक धनुष, दिव्य बाण तथा रक्षार्थ कवच धारण किये प्रकट हुए थे। उनके उत्पन्न होनेपर समस्त प्राणी बड़े प्रसन्न हुए और सब ओर से वहाँ एकत्रित होने लगे। और फिर वेन स्वर्ग को सिधार गया।

महात्मा पृथु-जैसे सत्पुत्र ने उत्पन्न होकर वेन को'पुम्' नामक नरक से छुड़ा दिया। उनका अभिषेक करने के लिये समुद्र और सभी नदियाँ रत्त एवं जल लेकर स्वयं ही उपस्थित हुई। आङ्गिरस देवताओं के साथ भगवान् ब्रह्मा जी तथा समस्त चराचर भूतंनि वहाँ आकर राजा पृथु का राज्याभिषेक किया। उन महाराज ने सभी प्रजा का मनोरञ्जन किया। उनके पिता ने प्रजा को बहुत दुःखी किया था, किन्तु पृथु ने उन सबको प्रसन्न कर लिया; प्रजा का मनोरञ्जन करने के कारण ही उनका नाम राजा हुआ। वे जब समुद्र की यात्रा करते, तब उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें जाने के लिये मार्ग दे देते थे और उनके रथ की ध्वजा कभी भङ्ग नहीं हुई। उनके राज्य में पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी। राजा का चिन्तन करने मात्र से सभी काम सिद्ध हो जाता था। सभी गौएँ कामधेनु बन गयी थीं और पत्तों के दोने- दोने में मधु भरा रहता था। उसी समय पृथु ने पितामह (ब्रह्माजी से सम्बन्ध रखने वाला) यज्ञ किया। उसमें सोमाभिषवके दिन सूति (सोमरस निकालनेकी भूमि) उसी यज्ञ से परम बुद्धिमान् सूत की उत्पत्ति हुई। उसी महायज्ञ में विद्वान् मागध का भी प्रादुर्भाव हुआ। उन दोनों को महर्षियों ने पृथु की स्तुति करने के लिये बुलाया और कहा-'तुम लोग इन महाराज की स्तुति करो। यह कार्य तुम्हारे अनुरूप है और ये महाराज भी इसके योग्य पात्र हैं।' यह सुनकर सूत और मागध ने उन महर्षियों से कहा-'हम अपने कर्मों से देवताओं तथा ऋषियों को प्रसन्न करते हैं। इन महाराज का नाम, कर्म, लक्षण और यश कुछ भी हमें ज्ञात नहीं है, जिससे इन तेजस्वी नरेश की हम स्तुति कर सकें। तब ऋषियों ने कहा- 'भविष्य में होनेवाले गुणों का उल्लेख करते हुए स्तुति करो।' उन्होंने वैसा ही किया। उन्होंने जो-जो कर्म बताये, उन्हीं को महा बली पृथु ने पीछे से पूर्ण किया। तभी से लोक में सूत, मागध और बन्दीजनों के द्वारा आशीर्वाद दिलाने की परिपाटी चल पड़ी। वे दोनों जब स्तुति कर चुके, तब महाराज पृथु ने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनूप देशका राज्य सूत को और मगध का मागध को दिया। 
पृथुको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई प्रजा से महर्षियों ने कहा- 'ये महाराज तुम्हें जीविका प्रदान करने वाले होंगे।' यह सुनकर सारी प्रजा महात्मा राजा पृथु की और दौड़ी और बोली- 'आप हमारे लिये जीविका का प्रबन्ध कर दें।' जब प्रजाओं ने उन्हें इस प्रकार घेरा, तब वे उनका हित करने की इच्छा से धनुष-बाण हाथ में ले कर पृथ्वी की ओर दौड़े। पृथ्वी उनके भय से थर्रा उठी और गौ का रूप धारण करके भागी। तब पृथु ने धनुष लेकर भागती हुई पृथ्वी का पीछा किया। पृथ्वी उनके भय से ब्रह्मलोक आदि अनेक लोकों में गयी, किन्तु सब जगह उसने धनुष लिये हुए पृथु को अपने आगे ही देखा। अग्नि के समान प्रज्वलित तीखे बाणों के कारण उनका तेज और भी उद्दीप्त दिखायी देता था। जब और कहीं रक्षा न हो सकी, तब तीनों लोकों की पूजनीया पृथ्वी हाथ जोड़ कर फिर महाराज पृथु की ही शरण में आयी और बोली- 'राजन् ! सब लोक मेरे ही ऊपर स्थित हैं। मैं ही इस जगत्‌ को धारण करती हूँ। यदि मेरा नाश हो जाय तो समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना। हे भूपाल। यदि तुम प्रजा का कल्याण चाहते हो तो मेरा वध न करो। मैं जो बात कहती हूँ, उसे सुनो। ठीक उपाय से आरम्भ किये हुए सब कार्य सिद्ध होते हैं। तुम उस उपाय पर ही दृष्टिपात करो, जिससे इस प्रजा को जीवित रख सकोगे। मेरी हत्या करके भी तुम प्रजा के पालन-पोषण में समर्थ नही होंगे। महामते! तुम क्रोध त्याग दो. मैं तुम्हारे अनुकूल हो जाऊँगी। तिर्यग्योनि में भी स्त्री को अवध्य बताया गया है; यदि यह बात सत्य है तो तुम्हें धर्म का त्याग नहीं करना चाहिये।'

पृथु ने कहा-भद्रे! जो अपने या पराये किसी एक के लिये बहुत-से प्राणियों का वध करता है, उसे अनन्त पातक लगता है; परन्तु जिस अशुभ व्यक्ति का वध करने पर बहुत-से लोग सुखी हों, उसको मारने से पातक या उप पातक कुछ नहीं लगता। अतः वसुन्धरे। मैं प्रजा का कल्याण करने के लिये तुम्हारा वध करूँगा। यदि मेरे कहने से आज संसार का कल्याण नहीं करोगी तो अपने बाण से तुम्हारा नाश कर दूँगा और अपने को ही पृथ्वी रूप में प्रकट करके स्वयं ही प्रजा को धारण करूंगा; इसलिये तुम मेरी आज्ञा मानकर समस्त प्रजा की जीवन-रक्षा करो; क्योंकि तुम सबके धारण में समर्थ हो। इस समय मेरी पुत्री बन जाओ, तभी मैं इस भयङ्कर बाण को, जो तुम्हारे वध के लिये लिये उद्यत है, रोकूँगा।

पृथ्वी बोली- वीर! निःसंदेह मैं यह सब कुछ करूँगी। मेरे लिये कोई बछड़ा देखो, जिसके प्रति नेह युक्त होकर मैं दूध दे सकूँ। धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भूपाल ! तुम मुझे सब ओर बराबर कर दो,जिससे मेरा दूध सब ओर बह सके। तब राजा पृथु ने अपने धनुष की नोक से लाखों पर्वतों को उखाड़ा और उन्हें एक स्थान पर एकत्रित किया। इससे पर्वत बढ़ गये। इससे पहले की सृष्टिमें भूमि समतल न होने के कारण पुरों अथवा ग्रामों का कोई सीमाबद्ध विभाग नहीं हो सका था। इस समय अन्न, गो रक्षा, खेती और व्यापार भी नहीं होते थे। यह सब तो वेन-कुमार पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है। जो-जो भाग समतल था, वहीं वहीं पर समस्त प्रजा ने निवास करना पसंद किया। 

उस समय तक प्रजा का आहार केवल फल-मूल ही था और वह भी बड़ी कठिनाई से मिलता था। राजा पृथु ने स्वायम्भुव मनु को बछड़ा बनाकर अपने हाथ में ही पृथ्वी को दुहा। उन प्रतापी नरेश ने पृथ्वी से सब प्रकार के अन्नों का दोहन किया। उसी अन्न से आज भी सब प्रजा जीवन धारण करती है। उस समय ऋषि, देवता, पितर, नाग, दैत्य, यक्ष,पुण्यजन, गन्धर्व, पर्वत और वृक्ष-सबने पृथ्वी को दुहा। उनके दूध, बछड़ा, पात्र और दुहने वाला ये सभी पृथक् पृथक् थे। ऋषियों के चन्द्रमा बछड़ा बने, बृहस्पति ने दुहने का काम किया, तपोमय ब्रह्म उनका दूध था और वेद ही उनके पात्र थे। देवताओं ने सुवर्ण मय पात्र लेकर पुष्टिकारक दूध दुहा। उनके लिये इन्द्र बछड़ा बने और भगवान् सूर्य ने दुहनेका काम किया। पितरों का चाँदीका पात्र था। प्रतापी यम बछड़ा बने, अन्तक ने दूध दुहा। उनके दूधको 'स्वधा' नाम दिया गया है। नागों ने तक्षक को बछड़ा बनाया। तुम्बी का पात्र रखा। ऐरावत नाग से दुहने का काम लिया और विषरूपी दुग्ध का दोहन किया। असुरों में मधु दुहने वाला बना। उसने माया मय दूध दुहा। उस समय विरोचन बछड़ा बना था और लोहे के पात्र में दूध दुहा गया था। यक्षों का कच्चा पात्र था। कुबेर बछड़ा बने थे। रजत नाभ यक्ष दुहने वाला था और अन्तर्धान होने की विद्या ही उनका दूध था। राक्षसेन्द्रों में सुमाली नाम का राक्षस बछड़ा बना। रजत नाभ दुहनेवाला था। उसने कपाल रूपी पात्र में शोणित रूपी दूध का दोहन किया। गंधर्वों में चित्ररथ ने बछड़े का काम पूरा किया। कमल ही उनका पात्र था। सुरुचि दुहने वाला था और पवित्र सुगन्ध ही उनका दूध था। पर्वतों में महा गिरि मेरु ने हिमवान्‌ को बछड़ा बनाया और स्वयं दुहने वाला बनकर शिलामय पात्र में रत्नों एवं ओषधियों को दूध के रूप में दूहा। वृक्षों में प्लक्ष (पाकड़) बछड़ा था। खिले हुए शाल के वृक्षने दुहने का काम किया। पलाश का पात्र था और जलने तथा कटने पर पुनः अङ्कुरित हो जाना ही उनका दूध था। इस प्रकार सबका धारण-पोषण करनेवाली यह पावन वसुन्धरा समस्त चराचर जगत्‌ की आधार भूता तथा उत्पत्ति स्थान है। यह सब कामनाओं को देने वाली तथा सब प्रकार के अन्नो को अड्‌कुरित करनेवाली है। गौ रूपा पृथ्वी मेदिनी के नाम से विख्यात है। यह समुद्र तक पृथु के ही अधिकार में थी। मधु और कैटभ के मेद से व्याप्त होने के कारण यह मेदिनी कहलाती है। फिर राजा पृथु की आज्ञा के अनुसार भू देवी उनकी पुत्री बन गयी, इसलिये इसे पृथ्वी भी कहते हैं। पृथु ने इस पृथ्वी का विभाग और शोधन किया, जिससे यह अन्न की खान और समृद्धिशालिनी बन गयी। गाँवों और नगरों के कारण इसकी बड़ी शोभा होने लगी। वेन-कुमार महाराज पृथु का ऐसा ही प्रभाव था। इसमें संदेह नहीं कि वे समस्त प्राणियों के पूजनीय और वन्दनीय हैं। वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणों को भी महाराज पृथु की ही वन्दना करनी चाहिये, क्योंकि वे सनातन ब्रह्म योनि हैं। राज्य की इच्छा रखने वाले राजाओं के लिये भी परम प्रतापी महाराज पृथु ही वन्दनीय हैं। बुद्ध में विजय की कामना करने वाले पराक्रमी योद्धाओं को भी उन्हें मस्तक झुकाना चाहिये। क्योंकि योद्धाओं में वे अग्र गण्य थे। जो सैनिक राजा पृथु का नाम लेकर संग्राममें जाता है, वह भयङ्कर संग्रामसे भी सकुशल लौटता है और यशस्वी होता है। वैश्यवृत्ति करनेवाले धनी वैश्यों को भी चाहिये कि वे महाराज पृथुको नमस्कार करें, क्योंकि राजा पृथु सबके वृत्तिदाता और परम यशस्वी थे। इस संसारमें परम कल्याण की इच्छा रखने वाले तथा तीनों वर्षों की सेवा में लगे रहने वाले पवित्र शूद्रों के लिये भी राजा पृथु ही वन्दनीय हैं। इस प्रकार जहाँ पृथ्वी को दुहने के लिये जो विशेष- विशेष बछड़े, दुहने वाले, दूध तथा पात्र कल्पित किये गये थे, उन सबका मैंने वर्णन किया।

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