जानें हिन्दू धर्म के 10 मूल तत्त्व (Main Elements of Hindu Religion)

हिन्दू धर्म के 10 मूल तत्त्व (Main Elements of Hindu Religion)

हिन्दू धर्म में प्रत्येक अपने धार्मिक विश्वासों के अनुरूप अर्चना, आराधना आदि करने के लिए स्वतन्त्र है। अपनी इसी विशेषता के कारण हिन्दू धर्म अद्यावधि अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम हो सका है। भारत को अधिकांश जनता हिन्दू धर्म को ही स्वीकार करती है। यद्यपि हिन्दू धर्म के कोई निश्चित सिद्धान्त अथवा मत आदि तो नहीं हैं, फिर भी कुछ ऐसे मूलतत्त्व हैं जो हिन्दू धर्म का प्राण कहे जा सकते हैं, जो इस प्रकार वर्णित किए जा सकते हैं-
हिन्दू धर्म के 10 मूल तत्त्व

1. सनातनता: यद्यपि हिन्दू धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं हुआ किन्तु अनादि काल से इसका विकास अक्षुण्ण रूप से होता आ रहा है, इस कारण इसे सनातन धर्म कहा जाता है। " एष धर्मों सनातनः"। 'श्रुति', 'स्मृति' के आधार पर इस धर्म की प्राचीनता स्पष्ट होती है और प्राचीनता की इस विशेषता के कारण ही इस धर्म ने अनेकानेक बाह्य तत्त्वों को अपने में एकाकार कर लिया। युग परिवर्तन के साथ भी यह धर्म अपने पथ से विचलित नहीं हुआ। बाह्य आक्रमण व आन्दोलन आदि भी इसके मूलरूप को प्रभावित नहीं कर सके। इसका कारण है कि यह सनातन सत्य पर आधारित है। इसी से यह धर्म प्राचीनतम, 'विकासशील सनातन धर्म कहलाता है।

2. आध्यात्मिकता: आध्यात्मिकता भी हिन्दू धर्म का एक मौलिक तत्त्व है। प्रत्येक हिन्दु ईश्वर के आध्यात्मिक स्वरूप को स्वीकार करता है। सभी को उस परम सत्ता की सम्पूर्णता पर विश्वास है और यह जगत् और इसकी समस्त वस्तुएँ उस परम सत्ता की ही अभिव्यक्ति हैं, ऐसा सभी को ज्ञात हैं। सत्, चित् और आनन्द-ये तीन उस आध्यात्मिक सत्ता के पक्ष हैं जो सच्चिदानन्द स्वरूप है और व्यक्ति सदैव उस आध्यात्मिक या ईश्वरीय दिव्य स्वरूप की अनुभूति करने के लिए प्रेरित रहता है। इस प्रकार हिन्दुओं का जीवन-दर्शन आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है।

3. पुनर्जन्म का सिद्धान्त: (Theory of Rebirth)— पुनर्जन्म का सिद्धान्त कर्मवाद के सिद्धान्त से ही जन्मता है। कर्मवाद के आधार पर व्यक्ति को अपने शुभाशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है और सभी कर्मों का फल एक ही जीवन में मिल पाना सम्भव नहीं होता, अतः उनको भोगने के लिए दूसरा जन्म धारण करना आवश्यक होता है। अतः पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार हमें जो योनि वर्तमान जन्म में प्राप्त हुई है उसका कारण हमारे पूर्व जन्मों के फल है। संनित और क्रियमाण कर्मों के फल भोगने के लिए पुनर्जन्म धारण करना आवश्यक है यह पुनर्जन्म का सिद्धान्त प्रत्येक हिन्दू को उसके जीवन में आने वाली आपत्तियों को सहन करने की शक्ति भी देता है।

4. ऋत नियम (Rit Niyam) - वेदों के आधार पर ऋत-नियम हिन्दू धर्म का मूलतत्त्व है। ऋत का अर्थ है 'नैतिक' और वैदिक धर्म में ऋत' को सूर्य, चन्द्र आदि प्राकृतिक शक्तियों का नियन्ता कहा गया है। जैसे जगत् के बाह्य पदार्थ सूर्य, चन्द्र आदि ऋत-नियम के आधार पर संचालित होते हैं उसी प्रकार इसकी आन्तरिक व्यवस्था भी 'ऋत' के आधार पर टिकी है अर्थात् यह जगत् एक नैतिक व्यवस्था (ऋत) में आबद्ध है। यह नैतिक नियम हो धर्म है-सभी श्रेष्ठजन इन नैतिक नियमों का पालन करते हैं; इसी से अधर्म पर धर्म को विजय सर्वत्र होती देखी गई है। नैतिक नियम मानव जीवन के लिए सर्वोपरि है।

5. विविधता में एकता (Unity in Diversity ) — हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपू मूलतत्त्व यह है कि इसमें विविधता में एकता पाई जाती है। हिन्दू धर्म के अन्तर्गत अने सम्प्रदाय, विचारधाराएँ रीति-रिवाज आदि पाए जाते हैं, सभी का दृष्टिकोण पृथक् पृथक् अनेक धार्मिक सम्प्रदाय, जैसे- वेदान्ती, अद्वैतवादी, सांख्य व न्याय-वैशेषिक आदि हैं कि 1 कोई भी ऐसी परम्परा नहीं है, जिसको परिपालना करने के लिए कोई हिन्दू बाध्य हो शै वैष्णव, आर्य समाज आदि सभी पृथक् पृथक् दृष्टिकोण रखते हुए भी सभी वेद को प्रमा मानते हैं। वास्तव में हिन्दू धर्म की यह विशेषता हो हमारे जनतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष राज्य मूल सिद्धान्त कही जा सकती है।

6. ईश्वर में विश्वास: हिन्दू धर्म का मूलतत्त्व यह है कि यह धर्म स्वीकार करता है कि दृश्यमान जगत की विविधता के पीछे एक आध्यात्मिक एकता है जो एक ईश्वर द्वारा संचालित है, वही उसका नियन्ता है और सारा संसार उसमें मोतियों की माला के धागे के समान पिरोया हुआ है। किन्तु इस ईश्वर का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है। इस धर्म में एक ही ईश्वर की सत्ता में विश्वास करना अनिवार्य नहीं है; विविध देवों के रूप में भी जगत् का नियन्ता परमात्मा ही है अर्थात् कोई भी समुदाय या समाज स्वेच्छा से किसी भी देव की आराधना कर सकता है। इस विषय में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है,
यह भी हिन्दू धर्म का मूल तत्त्व है।

7. कर्म का सिद्धान्त (Theory of Karma ) — हिन्दू धर्म कर्म के सिद्धान्त में विश्वास रखता है। उसके मत में प्रत्येक को अपने शुभाशुभ कर्मों का फल अनिवार्यतः भीगना पड़ता है। कर्म ही व्यक्ति के जीवन को नियन्त्रित करते हैं अर्थात् मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है वह जैसे सद्-असद् कर्म करेगा, उसे उसी प्रकार की भूमिका निभानी होगी। यह कर्म का सिद्धान्त हिन्दुओं को बुरे करने से रोकता है और सद्कर्मों को करने की प्रेरणा देता है। कर्मों के फल संस्कार रूप में सुरक्षित रहते हैं जो भावी जीवन को संचालित करते हैं। यह कर्मवाद का सिद्धान्त महत्त्वपूर्ण मूल तत्त्व है। जैसा कि कहा गया है, " अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्" अर्थात् हर कोई अपने शुभाशुभ कर्मों का अनिवार्य फल भोगता है।

8. मोक्ष का सिद्धान्त Theory of Moksha): हिन्दू धर्म के अनुसार मानवीय आत्मा भवबन्धन से छुटकारा प्राप्त कर मोक्ष की कामना करती है। भव-बन्धन से मुक्ति प्राप्त करना हो हिन्दुओं का चरम ध्येय है। उनका विश्वास है कि सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु व भौतिक जगत् आदि के चक्र से मुक्त होकर उन्हें अवश्य प्राप्त होगी और इस अमरत्व को प्राप्त करना ही मोक्ष है। हिन्दू धर्म के अनुसार इस मुक्ति को प्राप्त करने के साधन अलग-अलग हो सकते हैं, जैसे- राजयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं कर्मयोग आदि; किन्तु साधनों की भिन्नता होते हुए भी साध्य एक ही है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति मोक्ष ही मानव जीवन का परम पुरुषार्थ है। धर्म, अर्थ, काम तीनों ही पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही हैं।

9. वर्णाश्रम व्यवस्था (Varnashram Vyavastha ) — हिन्दू धर्म में वर्णाश्रम- व्यवस्था का विशेष महत्त्व है। इस व्यवस्था के द्वारा समाज और व्यक्ति के जीवन को क्रमशः चार वर्णों एवं चार आश्रमों में बाँटा गया है। वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत समाज चार वर्णो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण में विभाजित किया गया है। इन चारों वर्णों के कार्य क्रमश: (1) बौद्धिक कार्यों की पूर्ति (2) समाज की सुरक्षा व्यवस्था (3) आर्थि क्रियाओं की पूर्ति तथा (4) सेवा करना है इसी प्रकार से प्रत्येक हिन्दू के जीवन को च आश्रमों में बाँटा गया है-ब्रह्मचयं, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास प्रथम दो आश्रम मनुष् के शारीरिक एवं सामाजिक दायित्वों को निभाने के लिए हैं और बाद के दोनों आवन ईश्व और मानवता के प्रति उच्चतर दायित्वों को निभाने के लिए हैं। चारों आश्रमों का निर्वह करना ही व्यक्ति का धर्म है। इस आश्रम व्यवस्था का निर्वाह करते हुए व्यक्ति अपने परिवा समाज, राष्ट्र और अन्त में विश्व के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है। आश्रम व्यवस बताती है कि व्यक्ति का अस्तित्व केवल स्वयं तक सीमित नहीं है वरन् उसका उद्देश समाज, राष्ट्र व विश्व के उच्चतम ध्येयों को पूर्ति करना है। इस रूप में वर्णाश्रम व्यवस नैतिक मूल्यों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

10. उदारता (Liberality ) — उदारता हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है। परिस्थितियों से अनुकूलन करने की सामर्थ्य, सहिष्णुता और लचीलेपन की विशेषता के कारण ही यह धर्म प्राचीनतम है। विश्व के सभी श्रेष्ठ धर्मों, सन्तों व महापुरुषों की शिक्षाएँ आज भी समादर के साथ यहाँ स्वीकारी जाती हैं। इस धर्म को सहिष्णुता उदारता का अक्षय कोष भी कहा जा सकता है।

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