जब पहली बार मैंने यह नाम सुना था पता नहीं क्यों मैं इस नाम के प्रति आकर्षित हुए। मुझे ऐसा लगा कि मुझको इस नाम के बारे में अधिक जानना चाहिए। जिसके लिये मैंने कई जगहों पर खोज की। जैसे जैसे मैं इस पात्र के बारे में जानता गया मेरा मन हैरान होता गया। मान्धाता के जन्म को कथा से लेकर उनकी मृत्यु तक सब सुनने में अविश्वसनीय सा लगता है। भगवान श्रीराम के अंदर वीरता और अजय रहने का गुण अवश्य इसने ही आया होगा। उन्होंने इंद्र को भी पराजित किया था। रावण जैसे महायोद्धा भी उनसे डरते थे। अगर रावण के पास अमृत कलश ना होता तो मान्धाता बहुत पहले ही युद्ध में उसको मार चुके होते। चलिए इनके बारे में जानते हैं।
जन्म की कथा:- मान्धाता के जन्म की कथा बहुत ही रोचक है। मान्धाता के पिता का नाम युवनाश्व थे जो के श्रीराम के एक महान पूर्वज थे। कहते हैं कि उन्होंने कई सहस्त्र यज्ञ किये थे। उन्होंने धर्म पालन की नई पराकाष्ठा पर कर दी थी। किन्तु उनकी कोई संतान नहीं थी। जिसकी वजह से वो बहुत दुखी रहते थे। जिसकी वजह से वो अपना सब मंत्रियों के हवाले करके वन में चले गये। वो वन में ही रहने लगे थे। इसी बीच भार्गव ऋषि उनके यहाँ पुत्र प्राप्ति का यज्ञ करने की बात को मां गये। युवनाश्व वन में ही ठहरे थे। एक दिन उन्हें वन में बहुत प्यास लगी। उन्होंने हर तरफ पानी की खोज की किन्तु उन्हें कहीं भी पानी ना मिला। वो जल ढूँढते ढूँढते ऋषि के आश्रम तक चले आये। उस वक़्त सभी ऋषिगण सो रहे थे इसलिए उन्होंने किसीको भी उठाना उचित ना समझा। तभी उन्होंने देखा कि वहाँ पर एक बर्तन रखा हुआ था। उन्होंने उस बर्तन का पानी पी लिया। जब यह बात ऋषिगणों को पता लगाया कि जो जल उन्होंने पी लिया है वो यज्ञ से उनके ही लिये संतान प्राप्ति के लिए संस्कार युक्त किया गया था। वो जल उनकी ही पत्नी के लिए था जो वो गलती से पी गये थे। यह जल पीकर उनको एक महातेजस्वी, महापराक्रमी इंद्र समान पुत्र प्राप्त हो जाता। ऋषि ने कहा क्योंकि तुमने यह जल पी लिया है अब अपने पुत्र को तुम ही जन्म दोगे। शायद नियति कुछ उद्देश्य से यह काम तुमसे करवा चुकी है। कहते हैं पूरे सौ वर्ष बाद जब उनकी बाएँ गर्भ को फाड़ा गया तब उसमें से एक पुत्र का जन्म हुआ। जब देवराज इंद्र को इस अद्भुत घटना का पता लगा तो उनके अंदर उस बालक को देखने की इच्छा हुई। फिर पृथ्वी पर आ गये। जब देवराज बालक के पास खड़े थे तभी किसी ने कहा कि यह बालक किसका दूध पियेगा। क्योंकि युवनाश्व तो एक पुरूष हैं वो स्त्री के भाँति बालक को दूध नहीं पिला सकते। यह सुनकर इंद्र ने अपना अंगूठा बच्चे के मुंह में डाल दिया और कहा कि 'मा धता'। यानी वो बालक इंद्र को ही पियेगा।इसके बाद सबने मिलकर बालक का नाम मान्धाता रखा। कहते हैं कि मान्धाता के सिर्फ सोचने से उसको सभी शास्त्र याद आ गए। सबसे शक्तिशाली देवास्त्र भी उसके पास चले आये। मान्धाता ने तीनों लोकों को मात्र एक दिन में ही जीत लिया था।
उन्होने कई सहस्त्र यज्ञ करवाये। जिसमे सैकड़ों बार अश्वमेध यज्ञ भी थी। अपने यज्ञ बल की सहायता से उन्होंने इंद्र का आधा सिंहासन तक हासिल कर लिया था। एक बार जब रावण के साथ मान्धाता का युद्ध हुआ था तो मान्धाता ने अकेले ही रावण की पूरी सेना का सरविनाश कर दिया था। जिसकी वजह से रावण में उनके ऊपर रौद्रास्त्र चला दिया था। जिसको मान्धाता ने अग्न्यास्त्र से रोक दिया। इसके बाद रावण ने उनपर गंधर्व अस्त्र का प्रयोग किया जिसको मान्धाता ने अपने ब्रम्हास्त्र से काट दिया। इसके बाद रावण ने पाशुपतास्त्र का आवाहन किया जिसकी वजह से पूरी सृष्टि में भय की स्थिति उत्पन्न हो गयी। किन्तु ऋषियों के कहने पर रावण ने पाशुपतास्त्र का उपयोग नहीं किया। उत्तरकाण्ड में बताया गया है कि जब मान्धाता ने पूरे स्वर्ग को जीतने की तैयारी की तो सारे देवता घबरा गये। तब इंद्रदेव ने मान्धाता ने कहा कि क्या तुम सम्पूर्ण विश्व को जीत चुके हो। जिसके जवाब में मान्धाता ने कहा सम्पूर्ण विश्व में कोई ऐसा नहीं है जो उनसे जीत सके। तब इंद्रदेव ने कहा कि तुम रावण को नहीं हरा पाए। इसपर मान्धाता ने कहा कि मैं रावण को पराजित कर चुका हूँ। क्योंकि रावण के पास अमृत कलश है जिसकी वजह से मैं उसके प्राण नहीं ले सकता। इसके बाद इंद्र ने कहा अभी एक व्यक्ति और हैं जिसको तुम नहीं हरा पाए हो। मान्धाता के पूछने पर इंद्रदेव ने बताया कि मधु दैत्य का पुत्र तुम्हे अपना राजा नहीं समझता। पहले जाकर उसको अपने अधीन करो फिर स्वर्ग जितने के लिये आना। यहाँ इंद्रदेव ने बहुत बड़ी चाल चली। सिर्फ उसको ही पता था कि लवणासुर के पास भगवान शिव का एक शूल है जिसको कोई पराजित नहीं कर सकता। मान्धाता को इस बात का कोई ज्ञान नहीं था। मान्धाता ने क्रोधित होकर लवणासुर पर आक्रमण कर दिया। जिसमें लवणासुर की लगभग सारी सेना मारी गयी और वो खुद बहुत जख्मी हो गया। आखिरकार उसने भगवान शिव के दिया शूल मान्धाता पर चला गया। उस अमोघ शूल के प्रहार से मान्धाता की वहीं मृत्यु हो गयी। इंद्र ने बहुत चतुराई से मान्धाता को मृत्यु के पास भेज दिया। लवणासुर का वध आगे चलकर भगवान श्रीराम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने किया।
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