राजर्षि विश्वामित्र के जन्म का कथा
यह आख्यान महाभारत के वन पर्व के 115 वें अध्याय से लिया गया है ।
कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज) में महापराक्रमी राजा गाधि राज्य करते थे । उनके एक परम सुन्दरी पुत्री थी जो अप्सराओं से भी सुन्दर थी जिसका नाम सत्यवती था। राजा गाधि के कोई पुत्र नहीं था । जब सत्यवती युवा हो गई तब उसके विवाह के लिए अनेक राज्यों से प्रस्ताव आने लगे।
महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि ऋचीक भी बहुत विद्वान थे। उनका प्रस्ताव भी राजा गाधि के पास आया । वे उस प्रस्ताव को टाल नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने विवाह के लिए एक शर्त रख दी कि यदि महर्षि ऋचीक ऐसे 1000 अश्व लाकर दें जिनका रंग श्वेत और पीत मिश्रित हो तथा जिनके कान एक ओर से काले रंग के हों।शर्त बहुत कठिन थी फिर भी महर्षि ऋचीक ने उसे पूरा करने का उद्योग करने का निश्चय कर लिया । वे इसके लिए वरुण देव के पास गये और उनसे वैसे अश्व देने की प्रार्थना की जैसा राजा गाधि ने कहा था । वरुण देव ने उन्हें ऐसे 1000 अश्व प्रदान कर दिये । महर्षि ऋचीक उन अश्वों को लेकर आ गये और महाराजा गाधि को सौंप दिया । तब महाराजा गाधि ने अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह महर्षि ऋचीक से कर दिया।
विवाहोपरांत महर्षि ऋचीक अपनी पत्नी सत्यवती को अपने आश्रम पर ले आये । अपने पुत्र और वधू को देखने के लिए महर्षि भृगु उनके आश्रम में पधारे तब दोनों पति पत्नी ने महर्षि भृगु का पूजन किया और उनकी उपासना की । तब महर्षि भृगु अत्यंत प्रसन्न हो गये और उन्होंने अपनी बहू सत्यवती से कोई वर मांगने को कहा । तब सत्यवती ने कहा
"तात् ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझसे पहले मेरी माता को एक पुत्र प्रदान कीजिए जिससे कान्यकुब्ज राज्य को उसका उत्तराधिकारी मिल जाये । उसके पश्चात मुझे भी एक पुत्र प्रदान कीजिए"।
महर्षि भृगु ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा "एवमस्तु ! तुम ऐसा करना बहू कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतुकाल में हों तब तुम तो गुलर का और तुम्हारी माता पीपल का आलिंगन करे । मैंने तुम दोनों के लिए दो चरु तैयार किये हैं । तुम दोनों अपने अपने चरु का भक्षण करना । तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी" । कहकर भृगु जी अन्तर्धान हो गये।
सत्यवती और उसकी माता ने ऐसा ही किया किन्तु दोनों ने उलटफेर कर दिया । सत्यवती ने गुलर के बजाय पीपल का और उसकी माता ने पीपल के बजाय गुलर का आलिंगन कर लिया। चरु भक्षण में भी उलटफेर कर दिया। महर्षि भृगु ने अपने दिव्य ज्ञान से यह सब जान लिया और वे सत्यवती के पास आये। उन्होंने कहा
"भद्रे, उलटफेर होने के कारण तुम्हारी माता के ब्राह्मण स्वभाव का और तुम्हें क्षत्रिय स्वभाव का पुत्र उत्पन्न होगा"।
इस पर सत्यवती ने कहा "भगवन ! इतनी कृपा करें कि मुझे ब्राह्मण स्वभाव का पुत्र हो जाये चाहे पौत्र क्षत्रिय स्वभाव का हो"। तब भृगु जी एवमस्तु कहकर चले गये।
इस प्रकार महर्षि ऋचीक के महर्षि जमदग्नि उत्पन्न हुए और महाराजा गाधि के राजर्षि विश्वामित्र उत्पन्न हुए। भृगु जी के वरदान से महर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम जी हुए जो क्षत्रिय स्वभाव के थे।
