बालक जगत्की शोभा है, वह प्राणीका सबसे अधिक मनोहर स्वरूप है। माके लिये तो वालक प्यारी बस्तु है ही, किंतु अन्य मनुष्योंके हृदयोंमें भी वह अपने प्रति बरबस प्रेम उत्पन्न कर देता है। मनुष्योंको मनुष्येतर प्राणियोंके भी बच्चे कितने प्यारे लगते हैं और हिंसक जानवरोंने भी मनुष्योंके बच्चोंको पाला-पोसा है, इसके भी अनेक उदाहरण मिलते हैं।
भक्तोंको भगवान्की बाल लीलाएँ जितनी मनभावनी लगती हैं: उतनी अन्य लीलाएँ नहीं। तुलसीदासजी और तुरदासजीके भगवान्की चाललोल्लाओंके वर्णन उनको कविताओं- के मधुरतम भाग हैं। श्रीकृष्णके गीता-ज्ञानापक स्वरूपने जगत्को उतना नहीं रिझाया है, जितना कि उनके दधि- माखन-चोर ग्वाल-बाल राधा-सुवाके बालस्वरूपने :
बालक की विश्वविजयिनी मोहिनी शक्ति, उसकी सरलता और उसके भोलेपन में है। वह पृथ्वी पर स्वर्ग के देवों को निदानता का प्रतीक है। वह कामवासना से अछूता है, इसीलिये उसे नारी के स्तनों को पीने का एवं समुद्रवसना वसुन्धरा पर नग्न ही क्रीड़ा करने का अधिकार है। क्रोध, लोभ, मद, मोह भले ही उसमें भी उमड़ते हों, लेकिन वे पानी की रेखा के सदृश तुरंत ही अदृश्य हो जाते हैं। वह तनिक-से मिट्टी के खिलौने- के लिये त्रिलोकी के राज्य को बिना चिन्ता के छोड़ सकता है और दूसरे ही क्षण उस मिट्टी के खिलौने को भी तोड़-फोड़कर फेंक देता है यह उसके मोह और अमोह, लोभ और अलोभ के उदाहरण हैं।
लेकिन संतके भोलेपनमें और बालकके भोलेपनमें अन्तर है। पहला शानजनित है और विकसित वासनाओंको स्वच्छ कर या उपशान्त कर उपार्जित किया हुआ है, जब कि दूसरा अज्ञानजनित है और वासनाओंके अविकसित (सुप्त) रहने के कारण है। इसलिये संतकी सरलता सशक्त तथा जागरूक रहती है और शक्ति एवं जागृतिका चिह्न है, जब कि बालककी सरलता दुर्बल है, दुर्वलताकी सूचक है और विकसित होनेवाली वासनाओंगे दूपित हो जानेवाली है। लेकिन क्योंकि बाल्यावस्थामें वासनाएँ अविकसित और अशक्तावस्थामें रहती हैं और वासनाओंका शासक मन भी अदृढ़ होता है, अतः शिक्षाके द्वारा एवं उपयुक्त परिस्थितियों- का संग्रह करके बुरी वासनाओंको विकसित या बलवान् बनने-