इस्लाम भारत में कैसे फैला, शांतिपूर्वक अथवा तलवार के बल पर।

कितना सच कितना झूठ
इस्लाम भारत में कैसे फैला, शांतिपूर्वक अथवा तलवार के बल पर । 

जैसाकि हम आगे विस्तार से बतायेंगे कि इस्लाम का विश्व में ( और भारत में भी ) विस्तार दोनों प्रकार ही हुआ है। उसके शांति पूर्वक फैलने के प्रमाण दक्षिणी पूर्वी एशिया के वे देश हैं जहाँ अब मुसलमान पर्याप्त और कहीं कहीं बाहुल्य संख्या में है। जैसे इंडोनेशिया, मलाया इत्यादि । वहाँ मुस्लिम सेनाएँ कभी नहीं गयीं । वह वृहत्तर भारत के अंग थे । भारत के उपनिवेश थे । उनका धर्म बौद्ध और हिन्दू था । किन्तु इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस्लाम निःसंदेह तलवार के बल पर भी फैला । यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इस्लाम में गैर मुसलमानों का इस्लाम में धर्मपरिवर्तन करने से अधिक दूसरा कोई भी पुण्य कार्य नहीं है । इस कार्य में लगे लोगों द्वारा युद्ध में बलिदान हो जाने अधिक प्रशंसनीय और स्वर्ग के द्वार खोलने का अन्य कोई दूसरा साधन नहीं है ।

इस्लाम का अत्यावश्यक मिशन पूरे विश्व को इस्लाम में दीक्षित करना है कुरान, हदीस, हिदाया और सिरातुन्नबी जो इस्लाम के चार बुनियादी ग्रंथ हैं, मुसलमानों को इसके आदेश देते है। इसलिए मुसलमानों के मन में पृथ्वी पर कब्जा करने में कोई संशय नहीं रहा। हिदाया स्पष्ट रूप से काफिरों पर आक्रमण करने की अनुमति देता है भले ही उनकी ओर से कोई उत्तेजनात्मक कार्यवाही न भी की गयी हो इस्लाम प्रचार प्रसार के धार्मिक कर्त्तव्य को लेकर तुर्की ने भारत पर आक्रमण में कोई अनैतिकता नहीं देखी । उनकी दृष्टि में भारत में बिना हिंदुओं को पराजित और सम्पत्ति से वंचित किए इस्लाम का प्रसार संभव नही था । इसलिए इस्लाम के प्रसार का अर्थ हो गया, " युद्ध और ( हिदुओं पर ) विजय "वास्तव में अंतर दृष्टिकोण का है। यह संभव है कि एक कार्य को हिन्दू जोर जबरदस्ती समझते हो और मुसलमान उसे स्वेच्छा समझते हो अथवा उसे दयाजनित कृत्य समझते हों। पहले का उदाहरण मोपला विद्रोह के समय मुसलमान मोपलाओं द्वारा मालाबार में 20000 हिन्दुओ के बलात् धर्मान्तरण पर मौलाना हसरत मोहानी द्वारा कांग्रेस की विषय समिति में की गयी, वह विख्यात टिप्पणी है जिसने गाँधी इत्यादि कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं की जबान पर ताले लगा दिए थे। उन्होंने का था :-( मालाबार ) दारुल हर्ब ( शत्रु देश) हो गया था। मुस्लिम विद्रोहियों को शक ( केवल शक ) था कि हिन्दू उनके शत्रु अंग्रेजों से मिले हुए हैं । ऐसी दशा में यदि हिन्दुओं ने मृत्युदंड से बचने के लिए इस्लाम को स्वीकार कर लिया तो यह बलात् धर्मान्तरयण कहाँ हुआ । यह धर्म परिवर्तन तो स्वेच्छा से ही माना जाएगा 

दूसरे दृष्टिकोण का उदाहरण, अब्दुल रहमान अज्जम अपनी द एटरनल मैसेज ऑफ मौहम्मद में प्रस्तुत करते हैं। उनका " जब मुसलमान मूर्ति पूजकों और बहुदेवतावादियों के विरुद्ध पुस्तक कहना है युद्ध करते हैं तो वह भी इस्लाम के मानव भ्रातृत्ववाद के महत्वपूर्ण सिद्धांत के अनुकूल ही होता है। मुसलमानों की दृष्टि में देवी देवताओं की पूजा से निकृष्ट विश्वास दूसरा नहीं है मुसलमानों की आत्मा, बुद्धि और परिणति इस प्रकार के निकृष्ट विश्वासधारियों को अल्लाह के क्रोध से बचाने के साथ जुड़ा हुई है । जब मुसलमान इस प्रकार के लोगों से उनको बचाने को अपना कर्त्तव्य समझकर उन्हें तब तक प्रताड़ित करते है। जब तब कि वे उन झूठ देवी देवजाओं में विश्वास को त्यागकर मुसलमान न हो जाएं । इस प्रकार के निकृष्ट विश्वास को त्यागकर मुसलमान हो जाने पर वे भी दूसरे मुसलमाने के समान व्यवहार के अधिकारी हो जाते हैं इस प्रकार के निकृष्ट विश्वास करने वालों के विरुद्ध युद्ध करना इस कारण से एक दयाजनित कार्य ही है क्योंकि उससे समान भ्रातृत्ववाद को बल मिलता है

कुरान में धर्म प्रचार के लिए बल प्रयोग के विरुद्ध कुछ आयते हैं
किन्तु अनेक विशिष्ट मुस्लिम विद्वानों का यह भी कहना है कि काफिरों को कत्ल करने के आदेश देने वाली आयत (95) के अवतरण के पश्चात् कुफ और काफिरों के प्रति किसी प्रकार की नम्रता अथवा सह उपदेश करने वाली तमाम आयतें रद्द कर दी गयी है । का 8/59 T उल्लाह का कहना है कि इस्लाम की घोषण के पश्चात् बल प्रभावल प्रयोग नहीं हे सैयद कुत्व का कहना है कि मानव मस्तिष्क और हृदय 1 को सीधे सीधे प्रभावित करने से पहले यह आश्यक है कि वे परिस्थितियाँ, जो इसमें बाधा डालती है, बलपूर्वक हटा दी जाए। (4) इस प्रकार वह भी बल प्रयोग को आवश्यक समझते हैं। जमाते इस्लामी के संस्थापक सैयद अबू आला मौदूदी बल प्रयोग को इसलिए उचित ठहराते हैं कि जो लोग ईश्वरीय सृष्टि के नाजायज मालिक बन बैठे हैं और ख़ुदा के बन्दों को अपना बंदा बना लेते है वे अपने प्रभुत्व से महज नसीहतों के आधार पर अलग नहीं हो जाया करते इसीलिए मौमिन (मुसलमान) को मजबूरन जंग करना पड़ता है ताकि अल्लाह की हुकूमत ( इस्लामी हुकूमत ) की स्थापना के रास्ते में जो बाधा हो, उसे रास्ते से हटा दें । ( 5 ) यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि इस्लाम के अनुसार पृथ्वी के वास्तविक अधिकारी अल्लाह उसके रसूल मौहम्मद और उनके उत्तराधिकारी मुसलमान ही हैं । इनके अतिरिक्त जो भी गैर मुस्लिम शासक हैं वे मुसलमानों के राज्यापहरण के दोषी हैं । अपहरण की गयी अपनी वस्तु को पुनः प्राप्त करने लिए लड़ा जाने वाल युद्ध तो सुरक्षात्मक ही होता है ।

19 दिसम्बर 1421 के लेख के अनुसार, जाफर मक्की नामक विद्वान का कहना है कि " हिन्दुओं इसलाम ग्रहण करने के मुख्य कारण थे मृत्यु भय, परिवार को गुलाम बनाए जाने का भय आर्थिक लोभ ( पारितोषिक, पेन्शन, लूट का माल ) धर्मान्तरित होने वालों के पैतृक धर्म में प्रचलित अन्धविश्वास और अन्त में इस्लाम के प्रचारकों द्वारा किया गया।

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