शिशुनाग वंश का संपूर्ण इतिहास।

शिशुनाग वंश ।

[ विक्रम संवत् पूर्व ५८५ (ईसवी सन् पूर्व ६४२) से वि० सं० पूर्व ३१५ (ई० स० पूर्व ३७२) तक।]

इस वंश का राज्य भारत में ईसा से करीब ६०० वर्ष पूर्व था । परन्तु अब तक इसका विशेष वृत्तान्त न मिलने के कारण पुराणों और बौद्ध-ग्रंथों के आधार पर ही हम इस वंशके राजाओं का इतिहास लिखने की चेष्टा करते हैं।
पुराणोंमें इस बंशके १० राजाओंके नाम मिलते हैं। इनमेंके सबसे पहले राजाका नाम शिशुनाग लिखा है। इसीके नामसे यह बंश प्रसिद्ध हुआ था। इस वंशके राजाओंका राज्य मगध (दक्षिणी विहार) पर था।

वायु पुराण में इस बंश का राज्यकाल ३६२ और मत्स्यमें ३६० वर्ष लिखा है।

१ शिशुनाग ।

इस बंश में सबसे प्रथम राजा यही हुआ था और इसीके नाम पर इस वंशका नामकरण होना प्रकट होता है।

मत्स्य और बायु पुराण में इसका ४० बर्ष राज्य करना लिखा है। इसकी राजधानी राजगृह (गया के पास) थी। स्मिथने लिखा है कि यह काशी का राजा था और बहीं से आकर इसने राजगृह में अपना राज्य जमाया था। इसका राज्यारोहण काळ वि० स० से ५८५ (ई० स० से ६४२) वर्ष पूर्व माना जाता है।

२ शाकवर्ण।

यह शिशुनागका उत्तराधिकारी था। वायुपुराणमें इसका नाम शाकवर्ण (शकवर्ण) और मत्स्य तथा विष्णुपुराणमें काकवर्ण लिखा है । मत्स्य और वायुपुराणमें इसका राज्यकाल ३६ वर्ष दिया है।

हर्षचरितमें लिखा है:-
"काकवर्णः शैशुनागिश्च नगरोपकण्ठे कण्ठे निचकृते निखिंशेन ।" अर्थात् शिशुनाग वंशी काकवर्ण को किसीने नगर के पास मार डाला।

३ क्षेमधर्मा ।

इसका नाम भी मत्स्य, वायु, विष्णु और ब्रह्माण्ड पुराणोंमें मिलता है। इन्हींमें इसके नामके क्षेमवर्मा, और क्षेमकर्मा आदि पाठान्तर भी मिलते हैं। मत्स्यपुराण में इसका राज्यसमय ३६ और वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणमें २० वर्ष लिखा है।

४ क्षत्रौजा ।

वायु, विष्णु और ब्रह्माण्ड पुराणबीमें इसका नाम क्षत्रौजा मिलता है। तथा पहले व पिछले पुराणों में इसका समय ४० वर्ष लिखा है। भागवत में इसका नाम क्षेत्रज्ञ है। परन्तु मत्स्यपुराण की भिन्न भिन्न प्रतियों में इसके नाम व राज्यवर्ष इस प्रकार दिये हैं:-

क्षेमजित् ३६, क्षेमार्चिः ४०, क्षेमवित् २४।

५ विम्बिसार

ब्रह्माण्ड और भागवत में इसका नाम विधिसार, विष्णुमें बिधिसार और विद्मिसार, वायुपुराण, महावंश व अशोकाबदान में बिम्बिसार, मत्स्यमें बिन्दुसेन या विन्ध्यसेन और परिशिष्टपर्व में श्रेणिक लिखा है। इसी प्रकार मत्स्य, बायु और ब्रह्माण्ड पुराण में इसका राज्यकाल २८ और महावंशमें ५२ वर्ष लिखा है।

महावंश में लिखा है, कि यह मगधका राजा और बुद्धका मित्र था, तथा आयुमें उस (बुद्ध) से ५ वर्ष छोटा था। इसने ५२ वर्ष राज्य किया और अन्त में यह अपने पुत्र अजातशत्रु के हाथ से मारा गया।

इस (बिंबिसार) के दो विवाह हुए थे। एक कोशल के राजा के यहाँ और दूसरा लिच्छवि वंश में। इसी लिच्छवि वंश की स्त्री से अजात- शत्रुका जन्म हुआ था।

दुल्वने लिखा है कि विम्बिसार ने अपने पिता के विजेता अङ्गदेश (मुंगेर-विहार) के स्वामी ब्रह्मदत्त को जीत कर उसकी राजधानी चम्पा पर अधिकार कर लिया था और भट्टिय की मृत्युपर्यन्त वहाँ रह- कर तब वह अपनी राजधानी राजगृह को लौटा था।

प्रसिद्ध जैन तीर्थकर महावीर भी इसके समकालीन थे और इन पर भी इस राजा की विशेष श्रद्धा थी। ऐसा भी लिखा मिलता है कि अपनी अन्तिम अवस्था में इसने राज्यप्रवन्ध अपने प्रियपुत्र अजात- शत्रुको सौंप दिया था। परन्तु उसने राज्यके लोभ से इसे मार डाला। सम्भव है, यह कथा कल्पित हो ।

उपर्युक्त वृतान्त से विदित होता है कि शायद इस वंशमें पहला प्रतापी राजा यही हुआ होगा। इसीने नवीन राजगृह बसाया था। मि० स्मिथ इसका राज्यारोहणकाल वि० सं० से ५२५ ( ई० स० से ५८२ ) वर्ष पूर्व अनुमान करते हैं।

६ अजातशत्रु ।

यह बिम्बिसार का पुत्र था। कथाओं से प्रकट होता है कि यद्यपि योग्य समझकर इसके पिता ने अपने जीते जी ही इसे राज्याधिकार दे दिया था, तथापि इसने लोभमें पड़कर उसे मार डाला। नहीं कह सकते कि इस कथामें कितना सत्य है।

महावंश में इसका राज्यारोहणकाल (गौतम) बुद्धनिर्वाण से ८ वर्ष पूर्व माना है।

सीलोन वालों के लेखानुसार वुद्धका निर्वाण ईसवी सन् से ५४४ वर्ष पूर्व मान उसमें ८ और जोड़ने से इस घटना का समय ई० स० से ५५२ ( विक्रम संवत्से ४९५) वर्ष पूर्व सिद्ध होता है।

अजातशत्रु पहले बौद्धमतानुयायियों का कट्टर विरोधी था और उन्हें कठोर से कठोरतर दण्ड दिया करता था। परन्तु अन्तमें बुद्ध का उपदेश सुन यह स्वयं भी बौद्ध हो गया।

वौद्धोंका अनुमान है कि बुद्ध के चचेरे भाई देवदत्त ने ही इसे पिता को मार राज्य पर कब्जा करने व बौद्धोंको दण्ड देनेके लिये उभारा था, क्यों कि देवदत्त बुद्धका कट्टर विरोधी था और इसी लिये उंसने अपना अलग ही एक सम्प्रदाय चलाया था। इस संप्रदायके अनुयायी पहले के बुद्धों को मानते हुए भी गौतमको बुद्ध नहीं मानते थे। परन्तु मि० स्मिथ इन कथाओंको धर्मद्वेषके कारण लिखा मानते हैं ।

फाहियान ने ईसवी सन् ४०५ के निकट अपने श्रावस्तीके वर्णन में इस संप्रदाय का उल्लेख इस प्रकार किया है:- " देवदत्त के अनुयायियों के भी संघ हैं। ये पूर्व के तीनों बुद्धों की पूजा करते हैं, केवल शाक्यमुनि बुद्ध को नहीं मानते ।"

सातवीं शताब्दीके चीनी यात्री हुएन्त्संग ने भी इस सम्प्रदाय के मठोंका कर्ण सुवर्ण (बंगाल) में होना लिखा है।
इससे प्रकट होता है कि ईसा की सातवीं शताब्दी तक भी उक्त सम्प्रदाय विद्यमान था।

प्रसिद्ध जैन तीर्थंकर महावीर भी अजातशत्रुके राज्य समय बिद्यमान थे और वैशाली (गंगा के उत्तर) के लिच्छवि राजघराने में जन्म लेने के कारण अजातशत्रु की मां के रिश्तेदार थे।

सामजफलसुत्त नामक बौद्धधर्म की पुस्तक में बुद्ध और अजात- शत्रु के समागम का वर्णन दिया है और यह भी लिखा है कि इस (अजातशत्रु) ने स्वयं भी अपने कर्मोंके प्रायश्चित के लिये बौद्धधर्म ग्रहण कर लिया था।

हम इसके पिता के इतिहास में उसके दो विवाह होना लिख चुके हैं। उस (बिम्बिसार) के मरनेपर इसकी सौतेली माँ कोशल-राज- कन्या भी अपने पतिके विरहमें परलोक को प्रयाण कर गई । इसके बाद इसके मामा कोशल राज ने अजातशत्रु पर चढ़ाई कर दी। परन्तु अन्तमें इन दोनों के आपस में सुलह हो गई और इसी के प्रमाणस्वरूप कोशलराज ने अपनी कन्या का विवाह इसके साथ कर दिया ।

इससे अनुमान होता है कि सम्भवतः इसने अपने शत्रुपर विजय पाई होगी; क्योंकि उसी समय से कोशलवाले इसकी प्रधानता स्वीकार करने लग गये थे, और ईसा से पूर्वकी चौथी शताब्दीमें कोशल देश भी मगधवालोंके अधीन हो गया था ।

अजातशत्रु ने लिच्छवियों की राजधानी वैशाली (तिरहुत) पर भी अधिकार कर लिया था ।इन सब बातों पर विचार करने से प्रकट होता है कि उस समय गंगा से हिमालय तक इसका अधीकार फैला हुआ था ।

लिच्छवियों को दवाने के लिये इसने गंगा और सोन के संगम के निकट पाटलि नगर (पाटलिपुत्र) में एक किला भी बनवाया था ।

मत्स्यपुराण में इसका राज्यकाल २७, बायु में २५ और ब्रह्माण्ड में ३५ वर्ष लिखा है।

इसी के समय कोशल के राजा वीरुधकने कपिलवस्तु पर हमला कर शाक्यों का संहार किया था। उपालि, काश्यप, आनन्द आदिकोंने राजगृहमें बौद्ध धर्मकी सभा भी इसीके राज्यसमय की थी ।

हेमचन्द्र रचित परिशिष्टपर्व में इसका नाम कृणिक लिखा है । मि० स्मिथ इसका राज्यारोहणकाल ईसवी सन्से करीव ५५४ (वि० सं० से ४९७) वर्ष पूर्व अनुमान करते हैं।

मथुरा के पास से एक मूर्ति मिली थी; जो अब वहीं के अजायब घर में रक्खी हुई है। इस मूर्ति के चारों तरफ फलकपर तीन पंक्तियों का लेख खुदा हुआ है। पहली और अन्तिम पंक्ति क्रमशः मूर्ति के दाई और बाई तरफ खुदी है तथा बीच की लाइन पैरों के बीच में है । मि० बोगस ने इनको इस प्रकार पढ़ा थाः

'[ वासिना [ गोमितकेन] कता'

नि] भदपुगरिना [क]... [ग] अड... पि... कुनि [क] ते

अर्थात् -कुनिक के शिष्य भदपुगरिन गोमतिक ने बनाया।

परन्तु श्रीयुत जायसवाल ने इस लेखको इस प्रकार पढ़ा है:-

'सेनिधज सत्रु राजो सिरि

४,२० (थ) १० (३) ८ (हियाहि) कुनिक सेवसि-नागो मगधानं राजा '

अर्थात् मगधराज अजातशत्रु श्री कुनिक ।

अतः श्रीयुत जायसवाल इन मूर्तियों को मौर्यकाल से पहले की ही अनुमान करते हैं ।

मि० स्मिथ भी इन मूर्तियों को मौर्य काल से पहले की ही मानते हैं।

७ दर्शक ।

पुराणों से पता चलता है कि यह अजातशत्रु का उत्तराधिकारी था। इसके दर्भक, हर्षक, दशक, वंशक आदि नाम भी मिलते हैं। इसका राज्यकाल मत्स्य और वायुपुराण में क्रमशः २४ और २५ वर्ष लिखा है। तथा ब्रह्माण्डपुराण में ३५ वर्ष दिया है।

कुछ विद्वानों का मत है कि प्रसिद्ध जैनतीर्थंकर महावीर इसके समय तक भी विद्यमान् थे; परन्तु नहीं कह सकते यह कहाँतक ठीक हैं। क्यों कि महावीर की मृत्यु ई० सन से ५२७ वर्ष पूर्व मानी गई है।

महावीर तीर्थकर का देहान्त पावा (पटना) में हुआ था। भासके 'स्वप्नवासवदत्ता' नामक नाटकमें इस राजा का वर्णन है। उससे प्रकट होता है कि दर्शक मगध का राजा था और इसकी बहिन पद्मावती का विवाह कौशाम्बी के राजा उदयन से हुआ था। इसी दर्शक ने सहायता कर उदयन के गये हुए राज्य को पीछा उसे दिलवा दिया।

उक्त नाटक का रचनाकाल ईसवी सन् की तीसरी शताब्दी अनुमान किया जाता है।

इसी के समय पर्शिया के राजा डेरियस (ईसवी सन् पूर्व से ५२१ से ४८५ तक) ने ई० स० से ५१६ वर्ष पूर्व के निकट हिरात, कन्धार सिन्ध, और उत्तर पश्चिमी पंजाबपर अपना अधिकार कर लिया था। बहुत से विद्वान् इस घटना का बिम्बिसार के समय होना अनुमान करते हैं।

८ उद्द्याश्व ।

पुराणों और बौद्धग्रन्थों में इसके उदायी, उदासी, उदयिभद्दक, उदांभि और अजय आदि नाम मिलते हैं। मत्स्य और वायुपुराण में इसका राज्यकाल ३३, ब्रह्माण्डमें २३ और महावंशमें १६ वर्ष लिखा है।

इसी ने अपने राज्य के चौथे वर्ष पाटलिपुत्र के निकट कुसुमपुर नाम का नगर बसाया था। वायुपुराण से भी इस बात की पुष्टि होती है। सिंहल के और दूसरे बौद्ध लेखकों ने अपने ग्रन्थों में दर्शक का नाम नहीं लिखा है। उन्होंने उदयाश्व को ही अजातशत्रु का उत्तराधिकारी माना है।
विन्सैण्ट स्मिथ इसका राज्यारोहण काल ईसवी सन् से ५०३ (वि० सं० से ४४६) वर्ष पूर्व अनुमान करते हैं।

सन् १८१२ में पटने के पास से दो मूर्तिया मिली थीं। ये आज- कल कलकत्ते के अजायबघर में 'भरहुत गैलरी' नामक कमरे में रक्खी हैं। इन मूर्तियों के दुपट्टे की कन्धों के नीचे की चुन्नटपर लेख खुदे हैं। इनमें से पहली ने सिरवाली मूर्ति के लेखको कनिंघहाम साहब ने इस प्रकार पढ़ा थाः-

'यखे सनतनन्द' (या-भरत)

और दूसरीको इस प्रकारः-

'यहे अचु सतिगित' (या-सनिगिक)

इन्हीं के आधार पर उक्त साहब ने इन मूर्तियों को यक्षों की मूर्तियाँ अनुमान किया था और इनके अक्षरों को अशोक के बाद के अक्षर माना था।

परन्तु श्रीयुत जायसवाल ने इन पर के लेखों को क्रमशः इस प्रकार पढ़ा है:-

पहली मूर्तिका लेख 'भगे अचो छोनिधिसे '

(अर्थात् पृथ्वीके स्वामी महाराज अज)

दूसरी मूर्तिका लेख सप्तखते वतनन्दि '

( अर्थात् - सम्राट् वर्तिनन्दि )

भागवतमें शिशुनाग वंशी उदद्याश्व के स्थान पर 'अज' और उसके पुत्र नन्दिवर्धन को 'अजेय' लिखा है। अतः जायसवाल महाशय पूर्वोक्त मूर्ति को इसी उदयाश्व की अनुमान करते हैं।

इसी प्रकार बायुपुराण में नन्दिवर्धन के स्थान में ' बर्तिवर्धन' का नाम होने से वे 'वर्तिनन्दि लेखबाली मूर्ति को उदयाश्व के पुत्र नन्दि- वर्धन की अनुमान करते हैं।

इन दोनों मूर्तियों पर मौर्यकालीन पत्थर के स्मारकों के समान ही चिकनाहट के होने से उनका अनुमान है कि ये मूर्तियों और इन परके लेख अशोक से पीछे के नहीं हो सकते; क्योंकि बाद की पत्थर की बनी मूर्तियाँ आदि पर ऐसी चिकनाहट नहीं पाई जाती है। अतः उनके मतानुसार ये मूर्तियाँ और लेख इन्हीं राजाओं के समय के होने चाहिए।

९ नन्दिवर्धन ।

मत्स्यपुराण में इसका राज्यकाल ४० और वायु तथा ब्रह्माण्ड में ४२ वर्ष दिया है। परन्तु महावंश में और आशोकावदान में इसके स्थान में अनिरुद्धक और मुण्ड लिखा है। और महावंशमें राज्यकाल केवळ ८ वर्ष ही दिया है। इसकी मूर्तिका वर्णन हम उदद्याश्व के इतिहास में कर चुके हैं। इसका राज्यारोहण ई० स० से ४७० (वि० सं० से ४१३) वर्ष पूर्व माना गया है।

उदयगिरि से जैन राजा खारवेल महामेघवाहन का एक लेख मिला है। इसका संशोधित संस्करण जायसवाल, और बनर्जी ने छपवाया है।

इससे प्रकट होता है कि, “खारवेल ने राजगृह के राजा पुष्यमित्र को हराकर मथुरा की तरफ़ भगा दिया था। यह पुप्यमित्र शुङ्गवंश का था। इसको बृहस्पति भी कहते थे। खारवेल ने अपने राज्य के ५ वें वर्ष एक नहर की मरम्मत करवाई थी जिसको नन्द ने उस समय से ३०० वर्ष पूर्व बनवाया था। इसी खारवेलका १३ वाँ राज्यवर्ष मौर्य संवत् १६५ (३० स० पूर्व १५७) में था।" मौर्य संवत् का आरम्भ ई० स० से ३२२ वर्ष पूर्व माना जाता है। अतः खारवेल के राज्य का आरम्भ मौर्य संवत् १५२ और ई० स० से १७० वर्ष पूर्व में हुआ होगा। तथा इसके राज्यका ५ वाँ वर्ष (मौर्य संवत् १५७) ई० स० पूर्व १६५ में पड़ा होगा। इसके ३०० बर्ष पूर्व अर्थात् ई० स० पूर्व ४६५ (वि० सं० पूर्व ४०८) में नन्दराजा ने उक्त नहर बनवाई थी । मि० विन्सैण्ट स्मिथ का अनुमान है कि उक्त नहर का बनवाने वाला यही नन्दिवर्धन होगा और पुराणों में जहाँ पर शिशुनागवंश के पीछे नवनन्दों का उल्लेख है वहाँ पर 'नव' शब्द नौ संख्याका बोधक न होकर • नवीन या बाद के नन्दों का बोधक होगा। क्षेमेन्द्र ने भी 'नन्दवर्धन' और महानन्दके लिये ' पूर्वनन्द विशेषण प्रयुक्त किया है।

१० महानन्दि ।

पुराणोंमें इसका ४३ वर्ष राज्य करना लिखा है। उन्हींके अनुसार यह इस वंश का अन्तिम राजा था। इसकी एक शूद्रा स्त्री से नन्द नामक पुत्र हुआ था। उसने इसके राज्य पर अधिकार कर इस वंश की समाप्ति कर दी।



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