ब्राह्मण कितना जातिवादी होता है जानें..!

ब्राह्मण जातिवादी कभी नहीं रहा वह मानव धर्म के आधार सनातन धर्म, न्याय, सत्य का समर्थक रहा है। अन्यथा क्षत्रिय शिरोमणि राम द्वारा ब्राह्मणकुलोत्पन्न रावण के वध के बाद राम की निन्दा करता अपितु ब्राह्मणों ने राम को भगवान् बना दिया। इसीलिए राम जी कहते हैं -
विप्रप्रसादात् धरणीधरोऽहम्
ब्राह्मणों की कृपा से मैं चक्रवर्ती राजा बन सका।

वस्तुतः बात सत्य है यदि वशिष्ठ तथा विश्वामित्र ब्रह्मर्षि न होते तो राम भगवान् नहीं होते। गर्गाचार्य, महर्षि सन्दीपन, तथा वेदव्यास नहीं होते तो कृष्ण को कौन जानता।
प्राचीनकाल में प्रत्येक राज्य में ब्राह्मण राजगुरु होता था इसलिए कहीं अन्याय भ्रष्टाचार नहीं होता था। सबके पास सुख समृद्धि वैभव थे।

इधर कलियुग प्रारम्भ होते ही धीरे-धीरे ब्राह्मणों की जीविका पर आघात पर आघात लगने लगे। फिर भी चाणक्य, आदि शंकराचार्य तथा आचार्यों ने धर्म को जीवित रखा।

एक बार त्रेता युग में भी सहस्रबाहु जैसे राजाओं ने ब्राह्मण, गौ तथा आश्रमों को ध्वस्त करना प्रारम्भ किया था तभी तपस्वी राम ने तप छोड़कर धर्म की रक्षा के लिए परशु उठाया, तथा परशुराम बनकर, चाहे जिस जाति का राजन्य यानी राजा हो उन सबको सबक सिखाया गद्दी से उतार कर हत्या नहीं किन्तु राजनैतिक हत्या की थी। अब फिर एक बार ब्राह्मणों को नीचा दिखाने के लिऐ प्रयत्न किए जा रहे हैं।
पुनः परशुराम की आवश्यकता अनुभव हो रही है। जितने भी भारत पर आक्रमण हुए उनमें सर्वाधिक क्षति ब्राह्मणों की ही हुई।
मुस्लिम शासन में मन्दिर तोड़े गए, ग्रन्थालयों में होली मनाई गई, हमारा प्राचीन ऋषि-महर्षियों का प्राच्यविद्या साहित्य जल गया। आज उन ग्रन्थों के नाम मिलते हैं परन्तु वह सब जल गए। अन्ततोगत्वा ब्राह्मणों की ही ज्ञान सम्पदा का विनाश हो गया।
अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी भाषा थोपने के लिए संस्कृत का हास किया मनुस्मृति, आश्वलायन गृहय सूत्र आदि धर्म शास्त्रों में अपभ्रंश जोड़े गए, ताकि भारत टूट जाए। गोवध का जघन्य पाप शुरू हुआ इससे ब्राह्मणों को ही क्षति पहुंची। फिर भी ब्राह्मण पुजारी कथा वाचक पुरोहित, ज्योतिषी बनकर समाज को सनातन धर्म को जीवित एवं जागृत रखा।
वर्तमानकाल में भी भारत को आजाद कराने में स्वतंत्रता का सूत्रपात करने में ब्राह्मण ही आगे रहा ब्राह्मण कन्या लक्ष्मीबाई ने सर्वप्रथम भारत की स्वतंत्रता के लिए बलिदान किया। स्वनामधन्य श्री मंगलपाण्डे ने स्वतंत्रता के लिए शंखनाद किया। पश्चात् अनेकों बलिदानों से भारत तथाकथित स्वतंत्र हो गया।
स्वतंत्रता के पश्चात् ब्राह्मणों को अनुमान था कि भारत को भारत बनाए रखने वाले भारत निर्माता ब्राह्मणों को उचित स्थान मिलेगा परन्तु उलटे आरक्षण की फाँसी का फन्दा ब्राह्मणों पर लटक गया।

ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय, नहीं केवल ब्राह्मणों के विकास का पक्षधर है अपितु ब्राह्मणों की आधार भूमि हिन्दू समाज एवं हिन्दुत्व के हितों पर भी पैनी दृष्टि रखता है। एक उदाहरण जैसे हॉलैण्ड में सभी के लिए शमशान स्थल निर्धारित थे परन्तु हिन्दू समाज के लिए नहीं उन्हें शव गाड़ने पड़ते थे, दाहकर्म तथा अन्त्यैष्टि संस्कार विधिवत् नहीं हो पाते थे। तथा अपराधी बालकों की जेल (कारागार) में सभी धर्मो के प्रतिनिधि राजगुरु के रूप में सुधार तथा शिक्षा के लिए नियुक्त थे परन्तु सनातन धर्मगुरु का नाम तक नहीं। जब वहाँ ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय की तथा सर्वाभौम सनातन धर्म महासभा की स्थापना हुई तथा लक्ष्यपूर्ति के लिए प्रतिनिधि हॉलैण्ड की महारानी से मिले। तब से हिन्दुओं के लिए पृथक् श्मशान गृह बने तथा बालकारागर में हिन्दू राजगुरु की भी नियुक्ति हो गई। यह है ब्राह्मणों की एकता की शक्ति, जिस को ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय ने ऊर्जान्वित किया। ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय का राजनीति से सीधे एवं प्रत्यक्ष कोई सम्बन्ध नहीं है। परन्तु ब्राह्मण विरोधी वातावरण का प्रतिरोध करना जरूरी है। यदि कोई राजनीति में जाना चाहता है उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होगा। क्योंकि शास्त्र आज्ञा देता है-

सैनापत्यं च राज्यंच, दण्डनेतृत्वमेवच।
सर्वलोकाधिपत्यं च, वेदशास्त्रविदर्हति।

सेनापतित्व, राज्यसंचालन, दण्डनेतृत्व (न्यायाधीशता )
तथा समस्त लोकों का अधिपत्य वेदशास्त्रज्ञ ही कर सकता है। उसका वह पात्र है उसमें अर्हता (क्षमता) है। क्योंकि प्रायशः ब्राह्मण सदाचारी न्यायप्रिय, सत्य का पक्षधर, कर्तव्य पालक, लोकहितैषी आध्यात्मिक समतावादी, पक्षपातरहित होता है। ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय की विप्रवर्ग से अपील है कि वह अपनी पहचान नहीं छोड़ें।
तिलक, यज्ञोपवीत, संध्या, संस्कार का पालन करता रहे, ताकि ब्रह्मवर्चस वर्तमान रहे। ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय अनेक वर्गीय ब्राह्मणों का समान आदर करता है। समस्त ब्राह्मण इस संगठन में प्रवेश के अधिकारी हैं यहाँ ब्राह्मण वर्ग भेद नहीं है। यह गौरव की बात है कि दक्षिण भारत के ब्राह्मण अपनी ब्राह्मण परम्परा के लिए सतर्क हैं। ब्राह्मण अन्तर्राष्ट्रीय एक ऐसी ब्राह्मण आचार संहिता के निर्माण के लिए प्रयत्नशील है जो सबके द्वारा समानरूप से आचरणीय हो। सम्मेलनों में ब्राह्मणों का ही नहीं अपने यजमानों, तथा सम्य अन्यजातीय लोगों को भी श्रोतारूप में आमंत्रित करना चाहिए ताकि सभी अनुभव कर सकें कि ब्राह्मणत्व क्या है, और सर्वजनहिताय उद्देश्य क्या हैं।

ब्राह्मण जन्म से लेकर समस्त जीवन तथा भरणपर्यन्त मरणोत्तर में भी सबका साथी है। जनता में प्रविष्ट भ्रमों का निवारण करना भी आवश्यक है। देश में राजतंत्रवाद, पूँजीवाद, साम्यवाद आतंकवाद, समाजवाद अनेकों वाद स्वार्थ पूर्ति के लिए चलते हैं, पर ब्राह्मण का तो एक ही सनातन 'आशीर्वाद' है जो सर्वोत्तम कल्याणकारीवाद है। ब्राह्मणों का ही घोषणापत्र है -

सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तुनिरामयाः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माकश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

ब्राह्मण कभी जातिवादी नहीं रहा जाति विरोधी भी नहीं 'यत्र विश्वंभवत्येकनीडम, सारा संसार एक परिवार है।' वसुधैवकुटुम्बक, सारी पृथ्वी एक कुटुम्ब है 'सर्वखलु इब्रह्म' यह समस्त जगत् ब्रह्म है। ऐसी उदार घोषणा करने वाला सृष्टि का अग्रज ब्राह्मण को कभी जातिवादी नहीं कहा जा सकता वह सर्वदा मानवतावादी रहा है। मानवता की एकता के लिए अनेकों शास्त्रों, दर्शनों की रचना की वह मानवतावादी रहा है। जातियों के विभाजन ने ब्राह्मण को अलग-थलग कर उसे एक जाति में बांधा है तथा वाध्य किया है। यदि जातिवादी होता तो 'कृष्णंवन्दे जगद् गुरुं' कह कर यदुवंशी कृष्ण को जगद् गुरु तथा अवतार की मान्यता नहीं देता। 

ब्राह्मण रावण का वध करने वाले श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम तथा अवतार नहीं मानता। ब्राह्मण सदा न्याय तथा सत्य का पक्षधर रहा है। गुण कर्म के आधार पर निर्णय करता जा रहा है। मत्स्यगन्धा निषाद कन्या से उत्पन्न द्वैपायन को महर्षि वेद्व्यास सनातन धर्म वेदोद्धारक नहीं बनाता। ब्राह्मणेतर नैमिषारणयवासी लोमहर्षण सूत से शौनकादि ऋषि कथा उपदेश श्रवण नहीं करते, दासी पुत्र नारद को देवर्षी की संज्ञा से अलंकृत नहीं करते। क्षत्रिय विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि पदवी प्रदान नहीं करते। महर्षिवाल्मीकि के रामयण का प्रचार नहीं करते। ऐसे सैकड़ों उदाहरण प्राचीन इतिहास में उपलब्ध हैं। ब्राह्मण भारत का निर्माता, भारतीय संस्कृति का रचनाकार है।

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