सूफियों द्वारा भारत का इस्लामीकरण
दोस्तों सूफियों के कारनामों पर दो अंग्रेजी पुस्तकें प्रकाशित हुई है । एक है सैयद अथर अब्बास रिजवी की पुस्तक द हिस्ट्री आफ सूफिज्म इन इण्डिया ।
इस पुस्तक के दो खण्डों में लगभग 1000 पृष्ठ हैं ।
दूसरी पुस्तक " The Shrine and Cult of Mu'In Al-Din Chishti of Ajmer
द आइन एण्ड कल्ट आफ मोइनुद्दीन चिश्ती आफ अजमेर " हैं और इसके लेखक पी० एम० करी है। और इसमें वह लिखते हैं कि हिन्दुओं के इस्लाम में धर्मान्तरण के मुख्य कारण थे मृत्यु भय ,पूरे परिवार की गुलामी का भय, आर्थिक प्रोत्साहन प्रलोभन, हिन्दुओं के अंदर व्याप्त अधविश्वासों की कट्टरता तथा मिशनरियाँ द्वारा उन्हें फुसलाया जाना।
मोहम्मद बिन कासिम से लेकर अन्तिम मुस्लिम शासक तक भारत में बिना अपवाद सभी मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों ने विभिन्न तरीकों से हिन्दुओं के धर्मान्तरण किया ।यद्यपि इस लोभ, प्रोत्साहन, जोर जबरदस्ती, मृत्युभय,आर्थिक दबाव और गुलामी के भय से सहस्रों हिन्दू इस्लाम ग्रहण कर रहे थे ।
परन्तु फिर भी भारत की विशाल जनसंख्या को, और हिन्दुओं में धर्मान्तरण के विरोध को देखते हुए उसकी गति अति धीमी थी ।
दोस्तों इसी कमी को पूरा करने तथा अफगानिस्तान ईरान सीरिया इत्यादि देशो की तरह भारत के सम्पूर्ण इस्लामीकरण करने के लिए इन सूफियों ने बीड़ा उठाया ।
विशाल भारत के गाँव गाँव, कस्बों कस्बों और शहरों के आसपास लाखों मजारें तथा कथित बाबा या पीर लोगों की है जिनमें से अधिकांश के साथ गाजी अथवा शहीद शब्द जुड़ा है। और गाजी एक प्रशंसित पद भी माना जाता है परन्तु गाज़ी का अर्थ होता है,किसी काफिर की हत्या करने वाला महापुरुष, भले ही वह हत्या छल से की गयी हो । शहीद का अर्थ होता है,किसी काफिर के हाथ से मारा जाने वाला अथवा इस्लाम की उन्नति के लिए युद्ध में अथवा ब्रिटिश शासन द्वारा मृत्यु दंड पाया व्यक्ति।
ये लोग कोई संत महात्मा नहीं थे । ये तो उन मुस्लिम सेना के साधारण सैनिक अथवा छोटे बड़े कमाण्डर थे जो भारत के इस्लामीकरण के लिए उन क्षेत्रों में आए थे । और उस स्थान पर युद्ध में हिन्दुओं द्वारा मार डाले गए थे। बाद में उनके अनुयायियों द्वारा उनकी कब्र को मजार का रूप दे दिया गया।
चमत्कार कष्ट निवारण करने के किस्से प्रचारित कर दिए गए। और कुछ मूर्ख हिन्दू अपने देवी देवताओं से निराश होकर उनकी पूजा में जुट गए । इनमें अधिकांश कब्रें उन सूफियों की भी हैं जिन्होंने बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया ।
ये सूफी लोग धर्मान्तरण के जुनून में इतने सरोबार थे कि समय समय पर तलवारे उठाकर काफिरों के विरुद्ध युद्ध में भी उतर आते थे।
सिलहट के शेख जलाला और उनके तुर्किस्तानी शिष्य मध्य एशिया से आए खतमुल ख्वाजगान नक्शबन्दी इस परम्परा के कुछ उदाहरण हैं ।
दोस्तों इन लोगों को अपने पूर्वज सूफियों द्वारा ईरान तथा मध्य एशिया के काफिरों के सामूहिक धर्मान्तरण का अनुभव था। जिसका उपयोग भारत में हिन्दुओं के धर्मान्तरण के लिए करना चाहते थे । कुछ पुस्तकों को पढ़ने से पता चलता है कि 14 वीं शताब्दी में इस्माइली प्रचारकों द्वारा अपने हिन्दू भक्तों मे यह प्रचार किया जाता था कि ( चौथे खलीफा) अली विष्णु के 10 वे अवतार, आदम शिव के दूसरे स्वरूप और मौहम्मद साहब वास्तव में ब्रह्म थे ( रिजवी ने यह शब्द स्वयं अध्याय 1 के पृ० 110 पर लिखा है
दोस्तों यह सूफ़ी हिन्दुओं पर प्रभाव डालने के लिए ये लोग न केवल हिन्दू सन्यासियों और योगियों जैसी वेषभूषा अपना लेते थे। अपितु जंगलों में जाकर हिन्दू सन्तों की तरह योग साधना और तपस्या का भी ढोंग करते थे। भजन, कीर्तन, प्राणायाम और हठयोग की क्रियाओं की साधना इसी उद्देश्य से की जाती थी। किन्तु भजन कीर्तन मोहम्मद और अल्लाह के नाम का होता था। जब लोग इनकी तपस्या और साधना से प्रभावित होकर उनकी ओर आकृष्ट हो जाते थे तो ये अपने जादुई चमत्कारों के ढोंग द्वारा उन पर रोब जमा लेते थे। उन्हें विश्वास दिला देते थे कि उनका परमात्मा से सीधा और घनिष्ठ सम्बन्ध है।
जैसे जैसे उनकी चमत्कारी शक्तियों की चर्चा जनता में फैलती जाती थी वैसे वैसे ही अनेक भोले भाले अंसविश्वासी हिन्दू भक्तों की संख्या बढ़ती जाती थी । उदाहरण के तौर पर दिल्ली के सूफी निजामुद्दीन औलिया के विषय में चर्चा मशहूर थी कि रात को उनके पास पंखदार ऊंट आता था जिस पर बैठ कर वह प्रतिदिन काबा जाकर नमाज पढ़ते हैं और प्रातः काल से पूर्व ही वापिस आ जाते हैं।
उनका दूसरा शिष्य जियाउद्दीन बर्नी था जो अपनी तारीखे फीरोजशाही के लिए विख्यात है इस इतिहास को पढ़ने से ही पता चल जाता है कि जियाउद्दीन हिन्दुओं के विषय में कितने कुत्सित विचार रखता था । वह अपनी पुस्तक तारीखे फीरोजशाही में हिन्दुओं के लिए कुत्ते और कौवे जैसे अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करता है। आरम्भ में सूफी लोग अपने भक्तों को ओम अथवा राम के स्थान पर अल्लाह का नाम जपने को और मोहम्मद की शरण माँगने की विनती करने को कहते थे।
साथ ही साथ उन्हें यह सहेज भी देते थे कि यह सब गुप्त रूप से करें क्योंकि स्थानीय हिन्दुओं द्वारा विद्रोह का भय सदैव बना रहता था । जब काफी भक्त अल्लाह और मौहम्मद के अनुयायी हो जाते थे तो शेष हिन्दू स्वयं ही उनसे भयभीत होने लगते थे ।
सूफी अपना तालमेल मुसलमान जमींदारों और शासन के दूसरे अधिकारियों से बनाए रखते थे इसलिए शासन से न्याय पाने के लोभ में अनेक लोग उनके कृपा पात्र बनने के लिए इस्लाम ग्रहण कर लेते थे । हिन्दू जमीदारों को मुसलमान बनाना विशेष लक्ष्य रहता था क्योंकि उन लोगों के धर्म परिवर्तन से जमींदार की समस्त जाति अथवा प्रजा का धर्म परिवर्तन सरल हो जाता था।
दोस्तों 1000 ई0 के बाद भारत के इस्लामीकरण का जो दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ उसमें एक ओर तो महामूद गजनवी से प्रारम्भ होकर दूसरे अनेक आक्रामक ,तलवार और कुरान लेकर भारत में घुसे अथवा उनके वंशजों ने भारत में इस्लाम का विस्तार तलवार के बल पर किया।
किन्तु दूसरी ओर सूफी लोग मुख में भजन कीर्तन चमत्कार के दावे और बगल में तलवार और कुरान लेकर आए । इनमें से अधिकांश प्रकट रूप से तलवार का उपयोग नहीं किया किन्तु कुछ ऐसे भी थे जो आवश्यकता पड़ने पर तलवार लेकर स्वयं भी जिहाद में उतर पडते थे।
सूफी इतने शक्तिशाली थे कि मुगलकाल के पत्तन के समय जब मेवाड़ और मारवाड़ राजपूत स्वतंत्र हो गए तब भी वे नागौर में सूफियों के प्रभाव को कम नहीं कर सके । जब अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण में देवगिरि विजय किया तो सैकड़ों सूफियों ने वहाँ जाकर अपनी खानकाहें स्थापित कर ली और धर्मान्तरण कार्य में लग गए। इनमें से कुछ ने खुल कर हिन्दुओं के विरुद्ध युद्ध में भाग लिया और इतने हिन्दुओं का वध किया कि उनके नाम के साथ कत्ताल और कुप्फार मंजन जैसे शब्द जुड़ गए। इनमें कुछ दूसरे ऐसे भी थे जो वर्षों तक जंगलों में योग साधना और तपस्या का ढोग करते थे। धीरे धीरे उनकी योगी तपस्वी ब्रह्मचारी होने और चमत्कार करने की ख्याति आस पास की हिन्दू जनता मे फैल जाती थी। फिर हिन्दू भक्त बनने लगते थे और फिर प्रारम्भ होता था वही धर्मान्तरण का सिलसिला जो आजतक चलता ही आ रहा है और कुछ मूर्ख लंपट हिन्दू आज भी उन मजारों पर चादर चढ़ा रहें हैं।