हिन्दू और कट्टरता का सम्बन्ध: क्या हिन्दू कट्टर होते जा रहा है?
दोस्तों दिल्ली सल्तनत में एक सुल्तान हुआ था-नाम था फिरोज तुगलक। तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक का पौत्र, पागल बादशाह कहे जाने वाले मुहम्मद तुगलक का चचेरा भाई और रज्जब तुगलक की औलाद - गयासुद्दीन तुगलक ने अबोहर के राजपूत सामंत राणा रणमल को युद्ध में मार गिराया और उसके पूरे परिवार को कैद कर लिया। जब रणमल की बेटी गयासुद्दीन के सामने पकड़ कर लायी गयी तो उसकी सुंदरता पर गयासुद्दीन के छोटे भाई रज्जब का दिल आ गया, रज्जब ने गयासुद्दीन से उसे अपने लिए माँग लिया। निकाह कर उसका धर्म भी बदलवा दिया और इसी निकाह से फ़िरोज़ पैदा हुआ।
मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु के बाद अगस्त 1351 ई. में फिरोज तुगलक दिल्ली का सुलतान बना। बचपन से ही उसके दिल में एक बात का डर बैठ गया था कि वह एक सुन्नी मुस्लिम पिता व हिन्दू माँ की औलाद है, शाही मदरसे में पढ़ने वाले उसके संगी-साथियों ने उसे यह बात कभी भूलने नहीं दी कि उसकी माँ एक काफ़िर थी।
जब वह सुल्तान बना तो उसे एक बात की चिंता सता रही थी कि हिन्दू औरत से पैदा होने के कारण कहीं उलेमा, अमीर और उसके अपने लोग उसे सच्चा मुसलमान मानने में शक न करने लग जायें ! हुकूमत करते समय अगर उसने हिंदुओं के प्रति ज़रा भी सहानुभूति रखी या उनके प्रति रत्ती-भर भी हमदर्दी जताई तो अमीर-उलमाओं को लगेगा कि एक काफिरी खून काफिरों के लिए ही पच रहा है। इस लिहाज से उसकी इस्लाम के प्रति वफादारी को खारिज भी किया जा सकता है, इतना ही नहीं आने वाले समय में और इस्लामिक इतिहास में उसको काफ़िर बुलाया जाएगा।
अब अगर उसे खुद को सच्चा मुसलमान साबित करना है तो उसे हिंदुओं का बहुत निर्ममता से दमन करना होगा ताकि लोग उसे एक सच्चा मुसलमान मानें, एक सच्चे ईमान वाले के तौर पर जाने। खुद को एक पक्का ईमानवाला दिखाने और अपनी दीनी मोहब्बत को साबित करने के लिए उसने हिन्दुओं पर इतने भयंकर अत्याचार किये कि आज भी इतिहास में उसे औरंगजेब और सिकन्दर लोधी का अग्रगामी कहा जाता है।
वह ता-उम्र हिन्दुओं पर भयंकर अत्याचार करता रहा। हिन्दू पदाधिकारियों और सरदारों को लात मार उनके पदों से हटा दिया, उनकी सम्पत्ति छीन ली गयी और भी जो हिन्दू छौटे-मोटे पदों पर थे, बाबूगिरी कर रहे थे सबको दफ्तरशाही से बाहर किया गया। हिन्दुओं को सल्तनत का नागरिक मानने से इनकार कर दिया। उन पर हर तरह के Tax लाद दिये और मुस्लिम जनता को टैक्स फ्री रखा। उसने हिन्दुओं को जिम्मी घोषित किया, उन्हे हर सरकारी सहायता से मरहूम कर दिया, हिन्दुओं के तीज-त्योहार और उत्सव पर रोक लगा दी गई, वह जीवन भर मन्दिरों और पूजागृहों को ध्वस्त करवाता रहा।
1360 ई. में नगरकोट पर आक्रमण कर ज्वालामुखी मन्दिर को नष्ट करवा दिया। मन्दिर के पुजारियों को गले में मूर्ति के टुकड़े गौ मांस के साथ एक कपड़े में बाँधकर लटकवाये, शहर भर में मारते-पीटते घुमाया और बाद में उनकी हत्या करवा दी। उसने हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के लिए लालच, भय, प्रताड़ना का हर सम्भव प्रयास किया जाता। सच्चा मुसलमान बनने की ललक उसमें इतनी थी कि उसने शिया मुसलमानों को भी नहीं बख्शा, उन पर भी उसने हर तरह के जुल्म किये। दरअसल वह अपने हिन्दू फोबिया से इतना ग्रस्त हो चूका था कि यूँ ही शौकिया तौर पर ही बिलावजह हिंदुओं को सताता रहता था
आज भारत के मुसलमान को अंदर ही अंदर हमेशा यह बात सालती रहती है कि उनके पूर्वज हिन्दू थे जिन्होने धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपनाया था। उनके पूर्वजों ने लोभ, लालच और डर से इस्लाम अपनाया था इसलिए वे दुनिया के किसी भी हिस्से में जाएँ, किसी भी देश में जाएँ लेकिन उनकी पहचान उनका पीछा नहीं छोड़ती। अरब देशों में सभी जानते हैं कि भारत का मुसलमान खालिस मुसलमान नहीं हैं। वे किसी भी अरीबियाई वंश परम्परा से नहीं आते, उनका अरब से दूर-दूर तक का भी कोई सम्बन्ध नहीं है, उनकी रगों में अरब के किसी कबीले का नहीं, हिंदुओं का खून दौड़ रहा है इसलिए अरब के शेखों की महफ़िलों में उनकी इतनी इज़्ज़त भी नहीं हैं कि कोई उन्हें पास बैठाकर टंगड़ी कबाब साझा कर सके।
हिन्दुस्थान का कितना भी बड़ा आलिम, मौलवी या मुफ़्ती क्यों ना हो, किसी शेख की रोजा इफ्तार दावत में निमंत्रण नहीं पा सकता, मस्जिद अल अक्शा और अल हराम के अंदरुनी आहते में प्रवेश नहीं मिल सकता। इनकी औकात सिर्फ बाहरी दलान और सीढ़ियों तक ही है, मस्जिदों में आने-जाने के लिए इनके लिए अलग दरवाजे हैं, वुजू करने तक के लिए हौद अलग है।
भारत के अंसारी को मदीना का अंसार क़बीला अपना वंशज नहीं समझता। भारत के कुरैशी को मक्का का क़ुरैश क़बीला अपना वंशज नहीं मानता। लेकिन ये नक़ली अंसारी और नक़ली कुरैशी बनकर सोचते हैं कि हम अरबी नस्ल के हो गए। मुसलमानों की विडंबना ये है कि अरबी लोग इनको अरबी नहीं मानते और ये ख़ुद को अरबी-ईरानी दिखाने का भरसक प्रयत्न करते हैं और इस दिखावे के लिए ज़्यादा कट्टर हो जाते हैं।
इसलिए ये अरब के शाही कबीलों को दिखाने के लिए और उनकी नजरों में खुद को सच्चा मुसलमान साबित करने के लिए हर उस चीज का विरोध करेंगे जो इनके अतीत से जुडी है, भारतीय सभ्यता-संस्कृति से सम्बंधित है। अपने पूर्वजों की legacy और heritage से पूरी तरह कटना चाहते हैं। इनके लिए होली के रंग गैर-मजहबी हैं, मंदिरों की घंटियों की आवाज़ से इनका मजहब खतरे में आ जाता है, वन्देमातरम इनके लिए हराम है, राष्ट्रीय गीत सुनने पर ये उठकर चल देते हैं, राष्ट्रीय ध्वज फहराते इनको नहीं देखा जाता, योग से इनको दिक्कत है जबकि अरब के मुस्लिम देशों ने योग का खुलकर स्वागत किया।
दुनिया में किसी देश के मुसलमान को कुछ हो जाए ये पहले घरों से निकल सड़कों पर आ जाते हैं। गाजा, इराक, बर्मा को लेकर ये आगजनी दंगे करते हैं जबकि गुजरात दंगे की अरब में कोई चर्चा तक नहीं होती।
हिन्दू समाज स्वभाव से कट्टर नहीं है। हिंदुओं में आज जो कट्टरता दिखाई दे रही है वह सिर्फ़ क्रिया की प्रतिक्रिया है। जो लावा हजार साल से अंदर ही अंदर सुलग रहा था आज वह सतह पर आ गया है। जिस दिन क्रिया समाप्त हो जाएगी स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया भी दिखाई नहीं देगी।
आज भी अधिकांश मुसलमानों को ये ग़लत फ़हमी है कि उन्होंने 800 साल हिंदुओं पर हुक़ूमत की और हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए ये बात जब-तब दोहराते रहते हैं। मुसलमान इस सत्य को जिस दिन स्वीकार कर लेंगे कि जिन हिंदुओं पर हुक़ूमत करने की डींगें हाँकते हो, वे इन डींगें हाँकने वाले मुसलमानों के ही पूर्वज थे, बहुत सी कट्टरता खत्म हो जाएगी। जो मुसलमान ताज महल और लाल क़िला बनवाने का झूठा दंभ भरते हैं, उन्हें ये सच स्वीकारना होगा कि इन्हें बनाने में इनके पूर्वजों का योगदान सिर्फ़ एक मज़दूर के रूप में है, निर्माता के रूप में नहीं।
आज यूरोप के देश जो दंश झेल रहे हैं वह हिन्दू समाज ने शताब्दियों झेला है। आज योरोप के मूल निवासियों में जो प्रतिक्रिया दिखाई दे रही है, कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया हिन्दू समाज में दिखाई दे रही है। इसे कट्टरता समझने की भूल ना करें।

